Saturday, April 16, 2011

देखते है - नाच

(अज्ञेय की कविता ' नाच ' पर एक बतकही.)


एक तनी हुई रस्सी है जिस पर मैं नाचता हूँ।
जिस तनी हुई रस्सी पर मैं नाचता हूँ
वह दो खम्भों के बीच है।
रस्सी पर मैं जो नाचता हूँ
वह एक खम्भे से दूसरे खम्भे तक का नाच है।
दो खम्भों के बीच जिस तनी हुई रस्सी पर मैं नाचता हूँ
उस पर तीखी रोशनी पड़ती है
जिस में लोग मेरा नाच देखते हैं।
न मुझे देखते हैं जो नाचता है
न रस्सी को जिस पर मैं नाचता हूँ
न खम्भों को जिस पर रस्सी तनी है
न रोशनी को ही जिस में नाच दीखता है:
लोग सिर्फ़ नाच देखते हैं।
पर मैं जो नाचता
जो जिस रस्सी पर नाचता हूँ
जो जिन खम्भों के बीच है
जिस पर जो रोशनी पड़ती है
उस रोशनी में उन खम्भों के बीच उस रस्सी पर
असल में मैं नाचता नहीं हूँ।
मैं केवल उस खम्भे से इस खम्भे तक दौड़ता हूँ
कि इस या उस खम्भे से रस्सी खोल दूँ
कि तनाव चुके और ढील में मुझे छुट्टी हो जाये -
पर तनाव ढीलता नहीं
और मैं इस खम्भे से उस खम्भे तक दौड़ता हूँ
पर तनाव वैसा ही बना रहता है
सब कुछ वैसा ही बना रहता है।
और वही मेरा नाच है जिसे सब देखते हैं
मुझे नहीं
रस्सी को नहीं
खम्भे नहीं
रोशनी नहीं
तनाव भी नहीं
देखते हैं - नाच ! ( 'नाच'-अज्ञेय )

' देखते हैं -नाच!'

इन तीन अंतिम शब्दों में यह पूरी कविता पढी जा सकती है. यह अज्ञेय की कविता है. उन की अधिकाँश कवितायें अपनी आखिरी पंक्तियों में पूरी पढी जा सकती हैं. वे मुक्तिबोध की कविताओं की तरह नहीं होतीं , जहां कोई पंक्ति आखिरी नहीं होती. एक से दूसरी पंक्तियाँ जुड़ती, बिछड़तीं,लड़तीं , जन्म लेती रहती हैं. उनकी कविताओं में समय का एक खौलता हुआ अविच्छिन्न बहाव मिलाता है. अज्ञेय की नज़र वहाँ होती है, जहां हम देखते हैं कि उस बहाव से कोई 'एक बूँद सहसा उछली,'उस एक उछाल , एक लहर, को उत्कर्ष के अंतिम बिंदु पर अपनी अद्भुत कौंध के साथ हम देखते हैं.

' देखते हैं- नाच!'

नाच एक छोर पर है . देखना दूसरे छोर पर. दोनों के बीच यह कविता तनी हुयी है.

नाच भी दो तरह का होता है. उल्लास से जब मन नाच रहा हो , देह भी नाचे बिना नहीं रह सकती. लेकिन जिन्दगी यों भी बहुत नाच नचाती है.

थाकेउँ जनम-जनम के नाचत, अब मोहि नाच न भावै।- दूलनदास.
जैसैं मंदला तुमहि बजावा, तैसैं नाचत मैं दुख पावा॥- कबीर.
अब हौं नाच्यौ बहुत गोपाल--सूरदास.

युग बदले , लेकिन दुःख का नाच नहीं बदला. देखिये , नजीर को भी ' किस किस तरह के नाच दिखाती हैं रोटियाँ '. कौन भूल सकता है, 'कफ़न' के पैसों की दारू के बाद घीसू माधव का नाच , मुक्तिबोध के 'मैं' का भयानक नाच - ' शून्य मन के टीन छत पर गर्म ' गोरख पांडे का राजा भी आसमान में उड़ती मैना को मार कर , उस के पंख नोच कर , उस की टांगें तोड़ कर , उसे नाचने के लिए कहता है .

ये सारे नाच अलग हैं, लेकिन कहीं एक जैसे भी हैं.कोई नचा रहा है . कोई रस्सी तनी हुयी है, नाचना पड़ता है. नाचनेवाला नाचना चाहता नहीं है.नाच से छुटकारा चाहता है , जितनी जल्दी मिल सके. लेकिन तनाव ढीलता नहीं . छुट्टी होती नहीं.

नाच है.नाचना नहीं है. नाचना मन से होता है. यही नाचना जब कलात्मक हो जाए तो नृत्य हो जाता है. लेकिन यहाँ नाच है. अज्ञेय तो मानते थे , कविता भाषा में नहीं , शब्द में होती है. भाषा तो गद्यमय होती है.शब्द उसे कविता बनाते हैं. कविता में शब्द चमकते हैं, दीप्त होते हैं. अपनी विशिष्ट अर्थवत्ता के साथ. लेकिन उस से घिरे नहीं!सूक्ष्म. सान्द्र. तरल . जटिल.

जी हाँ , जटिल. यह नाच भी महज नाच नहीं है. क्या यह एक प्रतीकात्मक नाच है ?जैसा अज्ञेय-प्रेमी रामस्वरूप चतुर्वेदी मानते हैं. संभवतः कुछ दूसरे लब्धप्रतिष्ठ आलोचक भी.यह हिंदी के आलोचकों की प्रिय कविता है.
क्या यह जीवन का प्रतीक है ?या कलाकर्म का ?कविकर्म का ?समाज में बुद्धिजीवी की भूमिका का ?हो सकता है.कविता में प्रतीकार्थों की संभावना होती ही है. सब पढ़ने वाले की श्रद्धा पर निर्भर करता है. अथवा अपेक्षा पर. आप दो खम्भों को व्यक्तिस्वातंत्र्य और सामाजिक अनुशाशन के प्रतीक समझ लीजिये . या संस्कृति और राजनीति के. सृजनशीलता और समायोजन के. स्वतंत्र बौद्धिकता और सत्ता द्वारा किये जाने वाले उस के इस्तेमाल के. कला और कला -प्रतिष्ठान के. रस्सी तन जायेगी और नाच शुरू हो जाएगा. यह कविता 'महावृक्ष के नीचे ' नामक संग्रह में है , जिस में अधिकतर कवितायें आपातकाल के परिदृश्य से सम्बंधित हैं, जिसे इस कविता में भी आसानी से पढ़ा जा सकता है.
चर्चित पकिस्तानी फिल्म ' खुदा के लिए' में एक संवाद है -'' इस्लाम में दाढी है , लेकिन दाढी में इस्लाम नहीं है.'' दाढी रखने की प्रथा इस्लाम में मिलती है, लेकिन यही इस्लाम नहीं है. मेरी इल्तज़ा यह है कि कविता में प्रतीकार्थ हो सकते हैं, लेकिन प्रतीकार्थों में ही कविता नहीं होती.आप खम्भे , रस्सी , नाच को प्रतीक मान लीजिये या खम्भे , रस्सी, नाच .इस से कविता के रूपभाव पर कोई फर्क नहीं पड़ता. अज्ञेय की भाषा में- 'रूप के भावग्रहण की चेष्टा' पर!

' हम निहारते रूप
कांच के पीछे
हांप रही है मछली

रूपतृषा भी
( और कांच के पीछे )
है जिजीविषा .' ( 'सोनमछरी '- अज्ञेय )

'भाव के रूपग्रहण की चेष्टा ' रूपवाद नहीं है , क्योंकि रूपतृषा आखिर जिजीविषा ही है , लेकिन कांच के आगे और पीछे उस का एक ही रूप नहीं है. कांच के आगे जो जीवन नृत्य करता सा दीखता है , वही कांच के पीछे हांफता हुआ दीखता है. यानी रूप अपने आप में न सत्य है न शाश्वत है. सब कुछ इस पर निर्भर करता है कि कौन कहाँ से देख रहा है.

' देखते हैं -नाच'.
, जो नाचना पड़ता है , उस से अलग है वह नाच , जो लोग देखते हैं. नाच देखना नृत्य देखने जैसा नहीं है. नृत्य देखने वाला देखते देखते खुद भी उस नृत्य में शामिल हो जाता है . नाच देखना तमाशा देखने जैसा है. एक मनोरंजन . एक दिलबहलाव. तमाशबीन का सरोकार महज सनसनी से होता है. जो कुछ वह देख रहा है , उस से उसका कोई भावनातमक बौद्धिक जुड़ाव नहीं, कोई बेचैनी नहीं , कोई व्यथा नहीं.
नाच में जितनी यंत्रणा है , उस से अधिक असंवेदनशीलता है इस नाच देखने में . नाचने वाला कौन है , वह क्यों और कैसे नाच रहा है, किस रस्सी पर किन खम्भों के बीच वह नाच रहा है, क्या है जो उसे नचा रहा है , वह रौशनी कैसी है जो उसे दिखा रही है , उस रौशनी का इंतज़ाम किस ने किया है , कहाँ किस कोण से वह रौशनी डाली जा रही है , जिस से क्या दिख और क्या छिप रहा है, जिन्हें महज नाच देखना है , उन्हें इन जैसे सवालों से क्या लेना देना. नाच देखना क्या है , कुछ भी ना देखना है. देखते हुए न देखना. अंधेपन से बड़ा अंधापन. भयानक जड़ता . दृष्टि की ऐसी जड़ता , जो दृश्य को भी जड़ बनाती है. नाच में छुपा हुआ जो मनुष्य है, जो हांफती हुयी मछली है , उसे निगल जाती है.

क्या होगा , अगर हम ऐसे ही नाच देखने वालों का समाज बन जाएँ .या बन गए हों. अज्ञेय ने जब यह कविता लिखी थी , तब तो न टेलीविजन था न इंटरनेट. लेकिन आज तो हम सब इस सवाल से चौतरफा घिर ही गए हैं.कृपया मुझे संचार क्रांति का विरोधी न समझा जाए. सवाल टेक्नोलॉजी का नहीं है , उस नज़रिए का है , जिस से हम देखते हैं -नाच. इस तरह देखने से हम एक नाचती हुयी छटपटाहट को महज नाच में बदले दे रहे हैं. इस तरह देखने से हम नचाये जाने वालों और खुद के बीच कांच की एक अदृश्य अनतिक्रम्य दीवार खींचे ले रहे हैं.बड़ी आसानी से यह भूलते हुए की कांच की दीवार के इस पार और उस पार, जो मनुष्य है , वह एक ही है ,

मैं नाच रहा हूँ . मैं देख रहा हूँ कि मैं क्या नाच रहा हूँ. कि मैं क्यों नाच रहा हूँ. मैं देख रहा हूँ कि लोग देख रहे हैं. लेकिन यह भी देख रहा हूँ कि लोग महज़ नाच देख रहे हैं. ये नाच देखने वाले क्या कभी हाथ बढ़ा , रस्सी की गाँठ खोल , मेरी छुट्टी होने देंगे ?क्योंकि नाच ख़त्म हो गया तो फिर देखने के लिए क्या रहेगा.

'देखते हैं -नाच'.
असल में यह कविता नाच के बारे में नहीं नाच देखने के बारे में है. अज्ञेय कहते थे की भोक्ता जब द्रष्टा बनने लगता है , तब दृष्टि पैदा होती है. जीवन दृष्टि और कला दृष्टि. लेकिन क्या होता है जब वह दर्शक बनने लगता है, मूकदर्शक ? नाच देखने वाला समाज नचाये जाने वाला समाज बनता है. मैं नचाया भी जा रहा हूँ . मुझे मेरा ही नाच दिखाया भी जा रहा है. मैं खुद ही तमाशा हूँ , और खुद ही तमाशाई. लेकिन वह कोई और है, जो इस शो का असली संचालक है .जिस ने खम्भे खड़े किये , जिस ने रस्सी तनवायी, जिस ने रौशनी का इंतज़ाम किया.

वह नाच के बाहर है . इस लिए उसे कोई नहीं देखता.

यह सांस्कृतिक सलवा-जुडूम है

(एक पुराना आलेख, क्योंकि संस्कृति के सलवा जूडूमी नयी योजनाओं के साथ पुनः सक्रिय हैं ..)


अशोक वाजपेयी ने लिखा है ('कभी-कभार', 19 जुलाई, 2009, जनसत्ता) कि कुछ लेखकों ने 'प्रमोद वर्मा स्मृति सम्मान समारोह' का बहिष्कार इसलिए किया कि छत्तीसगढ़ सरकार नक्सलियों का 'जनसंहार' कर रही है.

यह एक झूठ है. सीधा-सादा सिद्ध झूठ.

बहिष्कार करनेवालों में एक थे पंकज चतुर्वेदी. विश्वरंजन के नाम उनका खुला पत्र 'अनुनाद' ब्लॉग पर समारोह के पहले ही प्रकाशित हो चुका था. सुना है, उसकी मुद्रित प्रतियाँ वहाँ बाँटी भी गयी थीं. उसमें कहा गया है कि समारोह के आयोजक विश्वरंजन ने मंगलेश डबराल द्वारा संपादित पत्रिका 'पब्लिक एजेंडा' के तभी प्रकाशित अंक में 'सलवा जुडूम' का खुलकर सम र्थन किया है. 'सलवा-जुडूम' के आलोचकों को नक्सलियों का सह योगी बताकर उनके खिलाफ़ हर तरह की लड़ाई लड़ने का संकल्प दोहराया है. विश्वरंजन छत्तीसगढ़ के डीजीपी और एक कवि भी हैं. 'सलवा-जुडूम' के क्रियान्वयन में उनकी नेतृत्वकारी भूमिका स्वाभाविक है. ख़ास बात यह है कि वे इसके सिद्धांतकार भी हैं. वे इसके पक्ष में पत्र-पत्रिकाओं में विस्तार से लिखते रहे हैं. लम्बे-लम्बे साक्षात्कार देते रहे हैं. 'दैनिक छत्तीसगढ़' में उनका एक साक्षात्कार सात खंडों में प्रकाशित हुआ था. वे महज़ पुलिस -अफ़सर नहीं, पुलिस-चिन्तक हैं.

क्या 'सलवा-जुडूम' की आलोचना करना नक्सली होना या उनकी हिमायत करना है?

अप्रैल, 2008 में 'सलवा-जुडूम' के सन्दर्भ में छत्तीसगढ़ की सरकार से सर्वोच्च न्यायालय ने कहा था :'यह सीधे-सीधे कानून-व्यवस्था का सवाल है. आप किसी भी नागरिक को हथियार थमाकर यह नहीं कह सकते कि जाओ, हत्याएँ करो! आप 'भारतीय दंड संहिता' की धारा 302 के तहत अपराध के उत्प्रेरक ठहराये जायेंगे.'

विश्वरंजन के मुताबिक़ 'सलवा-जुडूम' के आलोचक वे नक्सली हैं, जिन्होंने तमाम मानवाधिकार संगठनों, गैर-सरकारी संगठनों और जनतांत्रिक आन्दोलनों में घुसपैठ कर ली है. या नक्सली नहीं भी हैं, तो उन्हें 'लोजिस्टिक सपोर्ट' देनेवाले हैं. संगी-साथी हैं. जैसे बिनायक सेन.

क्या सर्वोच्च न्यायालय में भी नक्सलियों ने घुसपैठ कर ली है? तो उसके खिलाफ़ विश्वरंजन कौन-सी लड़ाई छेड़नेवाले हैं? दिसम्बर, 2008 में सर्वोच्च न्यायालय के सामने छत्तीसगढ़ सरकार ने क़बूल किया कि 'ख़ास पुलिस अफ़सरों' (एसपीओज़) ने आदिवासियों के घरों में आग लगाई है, लूटपाट भी की है. कुछ के खिलाफ़ दंडात्मक कार्रवाई भी हुई है.' लेकिन असली सवाल यह है कि क्या किसी संवैधानिक लोकतांत्रिक राज्य को 'सलवा-जुडूम' जैसा अभियान चलाने का हक़ दिया जा सकता है? सर्वोच्च न्यायालय की राय है कि नहीं. हमारी-आपकी?

'तहलका' (अँग्रेज़ी) के ताज़ा अंक में उन आदिवासी युवतियों के विस्तृत बयान छपे हैं, जिनके साथ 'ख़ास पुलिस अफसरों' (एसपीओज़) ने आम पुलिस की मदद से नृशंस बलात्कार किये हैं. वे महिलाएँ 'सलवा-जुडूम' के कैम्पों में ही थीं, किसी 'नक्सली' गाँव में नहीं ! छत्तीसगढ़ पुलिस तो उनकी मदद क्या करेगी, 'राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग' की जाँच टीम ने भी अपनी रिपोर्ट में लिख दिया कि ये झूठे आरोप हैं. यहाँ दिलचस्प बात यह है कि उस 'जाँच टीम' के सभी सदस्य पुलिस अधिकारियों में-से चुने गये थे.

'सलवा-जुडूम' क्या है? countercurrents.org पर "विश्वरंजन के नाम एक आम नागरिक का खुला ख़त" प्रकाशित है. लेखक हैं अनूप साहा. इस ख़त से 'सलवा-जुडूम' को समझना आसान हो जाता है.

'स्ट्रेटेजिक हैमलेटिंग' (इसकी हिन्दी सुझायें, अशोक जी!) का प्रयोग अमेरिकी सेना ने विएतनाम में किया था. इसकी तीन ख़ास बातें हैं. आबादियों की ऐसी घेराबंदी की जाये कि उन्हें जीवन-निर्वाह के सभी साधनों के लिए घेरा डालनेवाली फ़ौज पर निर्भर हो जाना पड़े. अगर यह मुमकिन न हो, तो उन्हें गाँवों से हटाकर विशेष कैम्पों में स्थानांतरित कर दिया जाये. इन कैम्पों की निगरानी करने और उनमें रहनेवालों को नियंत्रित करने के लिए उन्हीं में-से 'सहयोगी' तत्त्वों को चुनकर उन्हें हरबा -हथियार, रुपये-पैसे के साथ फ़ौजी ट्रेनिंग मुहैया करायी जाये. दुश्मनों के साथ लड़ाई में उन्हें अग्रिम दस्ते की तरह इस्तेमाल किया जाये. बदले में उन्हें मनमानी करने की छूट दी जाये. इसके दो अहम फ़ायदे हैं. एक, इन 'ख़ास पुलिस अधिकारियों' (एसपीओज़ ) से वह सब कुछ कराया जा सकता है, जिसे करने में संविधान के तहत काम करनेवाली पुलिस हिचकती है. दूसरे, इसे स्थानीय आबादियों की आपसी लड़ाई के रूप में दिखाया जा सकता है, जिससे सरकार का दमनकारी चेहरा दिखायी न पड़े. 'सलवा-जुडूम' के विषय में किये गये सभी स्वतन्त्र अध्ययनों में उसकी ये तमाम विशेषताएँ उजागर होती हैं.

स्थानीय लोगों को आतंकित और अपमानित करने की सबसे आसान तरकीब है – महिलाओं का अपमान और उत्पीड़न. सीएवीओडब्ल्यू (C.A.V.O.W.) ने 'सलवा-जुडूम' से सम्बन्धित अपनी 2007 की एक रपट में इसका ब्योरा दिया है. 'फ़ोरम फॉर फैक्ट फाइंडिंग डॉक्युमेंटेशन एंड एडवोकेसी' ने अपने अध्ययन में पाया है कि केवल दंतेवाड़ा के दक्षिणी ज़िले में 'सलवा-जुडूम' ने बारह हज़ार नाबालिग़ बच्चों का इस्तेमाल किया है. 'एशियन सेंटर फॉर ह्यूमन राइट्स' की रपट भी इसकी पुष्टि करती है. 'विकीपीडिया' पर यह सारी जानकारी सुलभ है.

'सलवा-जुडूम' के चलते दहशत में जीनेवाले आदिवासियों की आबादी कम-से-कम डेढ़ लाख है.

छत्तीसगढ़ के जंगल और ज़मीन क़ीमती हैं. वहाँ अपार खनिज संपदा है. उन पर बलशाली कम्पनियों की नज़र है. छत्तीसगढ़ सरकार ने सन 2000 से अब तक तिरेपन समझदारी पत्रों (एमओयू ) पर दस्तख़त किये हैं. 23,774 एकड़ भूमि के अधिग्रहण की प्रक्रिया शुरू हो चुकी है. बिड़ला ग्रुप, टाटा ग्रुप, गुजरात अम्बुजा सीमेंट, एसीसी, लाफार्ज, एस्सार, बाल्को, वेदान्त ... अनगिनत कंपनियाँ हैं, जिन्हें वहाँ लाखों एकड़ मुक्त ज़मीन चाहिए. आदिवासी इन्हीं ज़मीनों को बचाने के लिए लड़ते हैं. उनके खिलाफ़ सरकारी मशीनरी साम-दाम-दंड-भेद की पूरी ताक़त से टूट पड़ती है. अब वे क्या करें कि ऐसे में उनके साथ खड़े होने के लिए केवल नक्सली पहुँचते हैं.

राज्य की विराट हिंसा के सामने आत्म-रक्षा के लिए हिंसा का सहारा लेना पड़े, इसे गाँधीजी तक ने अनुचित नहीं ठहराया है. लेकिन उत्तेजक, अराजक और आक्रामक हिंसात्मक कार्रवाइयां जन-आन्दोलनों को व्यापक जनता से अलगाव में डालती हैं. न सुधारी जा सकने लायक़ ग़लतियों, विकृतियों और बन्धुघाती हिंसा की संभावना बढ़ जाती है. इससे संघर्ष की असली ज़मीन छूट जाती है. दमन और उत्पीड़न आसान हो जाता है. आम आबादी की दो पाटों के बीच पिस जाने की-सी हालत हो जाती है.

नक्सलियों की ओर से की गयी अराजक हिंसा निन्दनीय है. लेकिन राज्य द्वारा की जा रही हिंसा अलग है. लोकतंत्र में राज्य की मशीनरी आम आदमी के खून-पसीने से चलती है. 'सलवा-जुडूम' के बलात्कारी 'ख़ास पुलिस अफ़सरों' ( एसपीओज़) को पालने-पोसने में जो धन ख़र्च हो रहा है, उसमें मेरे-आपके खून-पसीने की कमाई शामिल है. इसमें हमारी-आपकी सीधी ज़िम्मेदारी बनती है. ऐसा नक्सलियों द्वारा की जा रही हिंसा के साथ नहीं है.

सरकार भी नक्सलियों का नहीं, आदिवासियों का जनसंहार कर रही है. अशोक जी के अवचेतन में भी कहीं यही बात रही होगी, इसीलिए वे नक्सलियों का 'जनसंहार' लिख गये. नहीं तो सभी जानते हैं कि इतनी जनसंख्या उनकी नहीं है कि 'जनसंहार' जैसे शब्द का प्रयोग संगत जान पड़े.

इस प्रसंग में मूल प्रश्न यह है कि क्या विश्वरंजन जैसे 'सलवा-जुडूम' के सिद्धांतकार केवल शौक़-शौक़ में सांस्कृतिक समारोहों का आयोजन कर रहे हैं? 'दैनिक छत्तीसगढ़' में छपे उनके एक लम्बे लेख में बड़ी मशक्कत से जनता को यह समझाने की कोशिश की गयी है कि नक्सली एक रणनीति के तहत छात्रों, बुद्धिजीवियों और संस्कृतिकर्मियों के बीच घुसपैठ बनाने की कोशिश कर रहे हैं. नक्सलियों की इस रणनीति से निपटना विश्वरंजन को सबसे बड़ी चुनौती जान पड़ती है. सुना है कि वे फ़िराक़ के नाती हैं. ख़ुद कवि हैं. निराला को पढ़ा ही होगा. "आराधन का दृढ़ आराधन से दो उत्तर ". घुसपैठ का दृढ़ घुसपैठ से दो उत्तर!

अब जब हिन्दी के बड़े कवि-लेखक उनके समारोहों में उनकी जय-जयकार करेंगे, सम्मानित होंगे, विरोधियों को नक्सली बताकर लांछित करने में उनके सुर-में-सुर मिलायेंगे, तो उन्हें अपनी रणनीति की कामयाबी पर गर्व क्यों न होगा!

यह 'सांस्कृतिक सलवा-जुडूम' है. 'स्ट्रैटेजिक हैमलेटिंग'. विरोधियों को अलग-थलग करो. उनकी सप्लाई-लाइन काट दो. सहयोगियों की घेराबंदी सम्मानों और सुविधाओं से करो. जनता से अलगाव में डालो..

गोरखपुर के योगी को भी सम्मानित करने के लिए उदय प्रकाश ही क्यों मिले? उन्हें हिन्दी के तरुण विजयों की याद क्यों न आयी? यह भूल-चूक-लेनी-देनी है? या "सांस्कृतिक स्ट्रैटेजिक हैमलेटिंग "?


(जनसत्ता, दिल्ली, 2 अगस्त, 2009 से साभार )
Posted by Ek ziddi dhun at 10:13 PM

Sunday, February 6, 2011

मार्क्सवादी आलोचना के प्रतिसंधों पर

(संतोष चतुर्वेदी संपादित ' अनहद ' के पहले अंक में प्रकाशित. समीक्षा के बहाने हिंदी की मार्क्सवादी आलोचना की नयी बहसों का एक जायजा.)


''प्रतिबद्धता के बावजूद '' आठवें नवें दशक में मार्क्सवादी आलोचना के भीतरी तनावों, अंतर्विरोधों और संघर्ष रेखाओं का एक महत्वपूर्ण दस्तावेज है. यह पुस्तक राजेन्द्र कुमार के सन अस्सी से लेकर अब तक लिखे गए आलोचनात्मक निबंधों का संग्रह है. दो खंडो वाले इस संकलन के पहले खंड में ' अभिप्राय' पत्रिका के लिए लिखे गए सम्पादकीय संकलित हैं , जब कि दूसरे खंड में कुछ अन्य निबंध हैं. 'अभिप्राय ' का पूरा दौर हिंदी की मार्क्सवादी आलोचना के लिए गहरे आतंरिक तनावों और दूरगामी बहसों का दौर है. इस उथल पुथल से निकल कर मार्क्सवादी आलोचना कहाँ पहुँची , और आज वह कहाँ और क्यों खड़ी है, इन सवालों में जिन की दिलचस्पी हो उन के लिए यह एक जरूरी किताब है.

आठवां दशक हिंदी साहित्य में कुछ बुनियादी बदलावों के लिए जाना जाता है. 'नयी कविता' - 'नयी कहानी' की व्यक्तिवाचक अंतरंगता और 'अकविता'- 'वाम कविता' की उद्धत बहिरंगता को छोड़ कर हिंदी ने समकालीनता के नए सामाजिक अन्तःकरण का आविष्कार किया. आलोचना के लिए यह एक चुनौतीपूर्ण समय था , क्योंकि नयी रचनाशीलता उस के बने बनाए चौखटों से बाहर निकल रही थी.ऐसे में मार्क्सवादी आलोचना की परम्परागत पद्धतियाँ और कसौटियां भी बहस के घेरे में आ रहीं थीं. मुक्तिबोध नयी कविता के दौर में ही आलोचना की जड़ीभूत सौन्दर्याभिरुची पर कशाघात कर चुके थे.उन्होंने अपने निबंधों में नयी मार्क्सवादी सौन्दर्य दृष्टि की मजबूत बुनियाद रखी थी , लेकिन व्यवहार में एक सुसंगत सैद्धांतिकी के रूप में उस का संगठित होना बाकी था , और शायद अब तक बाकी है.

विचारधारा , वर्गदृष्टि और प्रतिबद्धता मार्क्सवादी आलोचना की सर्वमान्य कसौटियां थी . लेकिन उन पर सवाल उठने लगे थे.स्वातंत्रयोत्तर के मोहभंग से जन्मी ' नयी कविता' - ' नयी कहानी ' की एकांतिकता और अनास्था से मुकाबला करने में तो वे कारगर रहीं, लेकिन साठोत्तरी के भूखी नंगी पीढी के सर्वनिषेधवादी विद्रोह की काट उन के पास न थी.इन विद्रोहियों की प्रतिबद्धता में कोई कमी नहीं थी . कमी थी अनुभव के तपाव में , जिसे आक्रोश के ताप से भरा जा रहा था.आठवें दशक में हिंदी की रचनाशीलता ने इसी विसंगति का निदान ढूँढते हुए एक नया मोड़ लिया. उस ने प्रतिबद्धता के ख़याल को नए अंदाज़ में समझने और बरतने की कोशिश की. प्रतिबद्धता किस के लिए ? वर्ग के लिए, विचारधारा के लिए ?या जीवन और उस की साहित्यिक कलात्मक पुनर्रचना के लिए भी? क्या प्रतिबद्धता पर्याप्त है ? अनिवार्य है?या वह महज़ एक राजनीति वैचारिक संकीर्णता है ?

पुस्तक का पहला ही लेख इस सवाल से टकराता है . बाकी लेखों में भी किसी न किसी कोण से इसी बुनियादी सवाल के साथ जोर आजमाइश की गयी है. राजेन्द्र कुमार सम्पादकीय लिख रहें हैं. सीधे पाठकों से मुखातिब हैं, आलोचकों और विद्वानों से नहीं . इस नाते उन की शैली संवादधर्मी और 'सुरझावनहारी ' है, उलझाऊ और लड़ाकू नहीं. सम्पादन और आलोचन के संयोग ने उन की शैली को वह सयंम और शालीनता बख्शी है , जो हिंदी में कभी- कभी संदेह की निगाह से देखी जाती है , जैसे इन 'दुर्गुणों' से आलोचना की प्रतिबद्धता में कुछ कमी आ जाती हो!

राजेन्द्र कुमार असंतोष को लेखक की आस्था का वास्तविक आधार घोषित करते हुए स्पस्ट निर्णय देते हैं कि लेखक को 'इस अधिकार से वंचित नहीं किया जा सकता कि यदि वह किसी सैद्धांतिक मतवाद से असंतुष्ट होता है तो उसे राजनीति अभिव्यक्ति भी दे सके.' इस अधिकार के बिना वह 'स्वस्थ परिवर्तनकामी प्रगतिशील शक्तियों' को अपना रचनात्मक सहयोग नहीं दे सकेगा. सांचेढली सुडौल कृतियों का निरर्थक ढेर भले ही खडा कर ले. लेकिन इस का मतलब यह नहीं
कि वे ' अछ्छी कुन्ठा रहित इकाई सांचे ढले समाज से ' के सिद्धांत या मतवाद के खोखलेपन को नहीं पहचानते. '' सांचे ढला समाज तो फिर भी संभव है लेकिन समाज से कटी किसी भी कुंठा रहित इकाई की तो कल्पना ही हवाई है. कुंठारहित समाज न हो तो सामान्यतया कुंठारहित इकाई कैसे रह सकती है ?'' इस लिए किसी राजनीतिक विचार के प्रति प्रतिबद्धता मात्र अपने आप में न तो सांचापन है न संकीर्णता. असलियत यह है
कि '' प्रतिबद्धता के दायरे में हमारी प्रगतिशीलता का सही पता यह देखने से चलेगा कि हम किधर बढ़ रहें हैं, - एक नितांत सांचे ढले समाज की ओर या एक सर्वथा जीवंत समाज की ओर . .. ..हमारी चिंता का मूल विषय यह होना चाहिए कि रचना में अनुभव और विचारधारा की अविछिन्न एकात्मता को कैसे उपलब्ध किया जाए .'' यह एकात्मता विचारधारा से अनुभव का काम लेने या उसे अनुभव का स्थानापन्न बना लेने की प्रवृत्तियों का जवाब है .

कोई पूछ सकता है कि अनुभव और विचार की यह एकात्मता किसी रचना में किस हद तक उपलब्ध हुयी है , इस का फैसला कैसे हो . एक अन्य लेख ' साहित्य में संघर्ष की स्थिति' में इस के कुछ ठोस संकेत मिलते हैं. 'कविता का प्रयोग करना' एक बात है. 'कविता को कविता बनाने का प्रयोग करना' एक दूसरी बात है.राजेन्द्र कुमार के विवेचन में यह दूसरी स्थिति ही विचार से अनुभव का काम लेने का उदाहरण है.अपनी बात स्पस्ट करने के लिए वे एक स्थापित कवि का उदाहरण देते हैं. .हिंदी में नाम लेकर स्थापित कवियों की ऐसी दो टूक आलोचना कम ही देखनो को मिलाती है. निर्भ्रान्त आलोचकीय निष्ठा और साहस का यह नमूना ध्यान देने लायक है.
'' घबराये हुए शब्द ' की शुरुआत में जगूड़ी रचना से अपनी वांछा को इन शब्दों में प्रकट करतें हैं-' अनुभव में तात्कालिक, स्वभाव में तत्व दर्शी , शैली से सभी विधाओं का प्रतिनिधित्व करने वाली , कथ्य में सब की आवाज़ लिए हुए, विन्यास में सर्वाधिक नाटकीय और असर में एकदम धर्म सरीखी मैं हर बार एक कविता लिखना चाहता हूँ. 'लेकिन जगूड़ी जब लिख चुकतें हैं तब हम पातें हैं कि अपनी वांछा के केवल एक ही पक्ष की पूर्ति वे कर सके. यानी ' विन्यास में सर्वाधिक नाटकीयता की' की. बाकी जो बची उन की कविता , वह अधिकांशतः अनुभव में काव्यातिरेकी, स्वभाव में चौकनी, शैली से सभी विधाओं का 'कविताकरण ' करने वाली . कथ्य में सिर्फ 'भाषा' लिए हुए और असर में कुल मिला कर एक कविता-सरीखी कविता ही बची !''
उदाहरण के लिए जगूड़ी का चुनाव मानीखेज है. जगूड़ी अकविता के दौर की उपज हैं , जिन्होंने अपनी कविता को समकालीन बनाने के लिए सतत कठिन उद्यम किया है. लेकिन प्रतिबद्धता के बावजूद समकालीनता उन्हें कितनी नसीब हो पायी, यह कुमार के विश्लेषण से स्पस्ट है.
कविता अगर प्रतिबद्धता और रचनात्मक उद्यम से हासिल नहीं होती , तो क्या वह किसी ' संवेदनात्मक अभिज्ञान ' से प्रस्फुटित होती है ? क्या यह समझा जाए कि वह क्रोचे की सहजानुभूति - सरीखी कोई वस्तु है ?शैलेश मटियानी का ' संवेदनात्मक अभिज्ञान' कुछ ऐसा ही है. वे इसे पुष्ट करने के लिए एक अद्भुत उदाहरण देते हैं.'' रेगिस्तानी इलाकों में लोग गाय को प्यासा रखने के बाद खुला छोड़ देते हैं और प्यास से व्याकुल गाय जहां खुरों से जमीन खोदना और फुंकारना शुरू करती है, ठीक वहीं कुआं खोदतें हैं.''
उदाहरण असरदार है . लेकिन कुमार अपने पैने विश्लेषण से इस संवेदनात्मक अभिज्ञान में निहित शक्ति- समीकरण के राजनीतक तर्क को उद्घाटित कर देते हैं. ' आगे कुछ न सूझने की अवसन्नता' शीर्षक निबंध में वे दिखालातें हैं-''कुआं खोदने के उद्देश्य से सही जमीन तलाशने के लिए , गाय को प्यासा रखने के बाद ही खुला छोड़ना अगर ' संवेदनात्मक अभिज्ञान' का सही तरीका माना जाए , तो फिर क्यों न सता और व्यवस्था कलाकारों , रचनाकारों को गाय मान कर ही चले ?.. ताकि रचनाकार की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का भ्रम भी न टूटे और जहां यह ....गाय प्यास से व्याकुल हो कर , तथाकथित संवेदनात्मक अभिज्ञान का परिचय दे, ठीक वहीं सत्ता अपनी व्यवस्था के अनुष्ठान से अपने लिए कुआं खोदना शुरू कर दे. रचनाकार रूपी गाय की प्यास की व्याकुलता आखिर में किस तरह सत्ता की प्यास बुझाए जाने का स्रोत बनाती है- यह उपर्युक्त उपक्रम से स्वतः स्पस्ट है. ''


कलानुभव उद्देश्यपूर्ण अभ्यास और उद्यम से उपलब्ध होता है अथवा अभिज्ञान या सहजानुभूति से? कलाचिन्तन के विकास का अब तक का इतिहास इस प्रश्न का समाधान नहीं कर सका है. दोनों पक्ष हमेशा बने रहते हैं . एक के बाद दूसरे का दौर दिखाई देता है. अभ्यास पक्ष हमेशा कला की उद्देश्यपूर्णता , सामाजिक मूल्यवत्ता और उस की इतिहास सम्बद्धता पर जोर देता दिखाई पड़ता है , जब कीं अभिज्ञान पक्ष अहैतुकता ,निजी अस्मिता और निरपेक्ष सुन्दरता पर. मार्क्सवादी कला चिंतन को आम तौर पर पहली श्रेणी से सम्बद्ध किया जा सकता है, जब कि कलावाद को दूसरी श्रेणी से.लेकिन सातवें दशक से यूरप अमरीका में भी मार्क्सवादी में एक नया मोड़ दिखाई दिया. इसे अक्सर नव -मार्क्सवाद या 'मार्क्सवाद की दूसरी परम्परा' कहा जाता है. इस परम्परा के ध्वजवाहक मार्क्स के जगत्प्रसिद्ध प्रौढ़ लेखन की तुलना में उन के शुरुआती लेखन पर अधिक जोर देते हैं , ख़ास तौर पर १८४४ की आर्थिक राजनीतिक पांडुलिपियों पर. सोवियत संघ के सरकारी समाजवाद की बदनामी और यूरप - अमरीका में साठ के विद्रोहों की नाकामी से निकली बौद्धिक निराशा इस नव- वाम की पृष्ठभूमि थी. फ्रैंकफर्ट स्कूल के नाम से विख्यात अडोर्नो, मार्क्यूस, बेंजामिन जैसे चिंतकों से गहरे प्रभावित इस धारा का , अस्सी के दशक में , हिंदी आलोचना पर सीधा असर पडा. नामवर सिंह के द्वारा संपादित ' आलोचना ' पत्रिका में निरंतर ऐसे लेख छप रहे थे , जिन में इस धारा से जुडी अवधारणायें दुहराई जा रहीं थी.परम्परागत मार्क्सवादी आलोचना वर्गीय प्रतिबद्धता पर जोर देने के चलते नयी रचनाशीलता को प्रोत्साहित कर पाने में समर्थ न थी, इस लिए इस नए मार्क्सवाद की ओर कुछ लोग गए. यह एक ऐसा मार्क्सवाद था , जो केवल सौन्दर्यात्मक ( कलात्मक- साहित्यिक) सक्रियता को ही ' मानवीय ', यानी अलगाव और विभाजन से मुक्त , कर्म के रूप में देख पाता था , और उसी से समाज में क्रांतिकारी बदलावों की उम्मीद भी करता था. ऐसे आलोचकों ने साहित्यकार की प्रतिबद्धता और साहित्य की 'सापेक्षिक स्वायत्तता' की जगह ( साहित्य की ) अस्मिता की बात चलाई.' सापेक्षिक स्वायत्तता' अर्थ - राजनीतिक संघर्ष की तुलना में संस्कृति कर्म की सापेक्षता पर बल देती है . इस के विपरीत 'अस्मिता' संस्कृत की स्वायत्तता पर अधिक बल देती है. कविता के नए प्रतिमान ' के दूसरे संस्करण (१९७४) की भूमिका में नामवर सिंह ने जेरेमी हौथौर्ण की पुस्तक (' Identiti and relationship' )का उल्लेख इसी सन्दर्भ में किया है. चूंकि राजनीतिक कारवाइयां सांस्कृतिक परिवर्तन करने में सफल नहीं हो पा रहीं थीं , इस लिए उम्मीद की जा रही थी सांस्कृतिक कारवाइयां राजनीतिक परिवर्तनों को आवेग देने का काम कर सकतीं हैं.इसी से ' अराजनीतिक राजनीति ' की अवधारना निकली , जिसे उस जमाने में राजनीति से अधिक कारआमद समझा गया.ध्यान देने की बात यह है कि ठीक इसी समय हिंदी की कविता - कहानी भी बदल रही थी.साठोत्तरी की घनघोर राजनीतिक भंगिमा को छोड़कर, जिसे 'बडबोलापन' कहा जा रहा था, एक सूक्ष्म परोक्ष राजनीतिक दृष्टि की बात कही जाने लगी. अब वर्गसंघर्ष ही लेखक की प्रतिबद्धता का एकमात्र केन्द्र्विंदु नहीं था. वह बदल रहा था. या 'व्यापक' हो रहा था.लेखक जीवन की व्यापकता पर ध्यान केन्द्रित कर रहे थे , इस उम्मीद में की वह उन्हें खुदबखुद सही राजनीति तक ले जायेगा.
राजेन्द्र कुमार प्रतिबद्धता की संकीर्ण समझदारी के खतरों को समझ रहे थे . लेकिन अराजनीतिक राजनीति के उलझाव से भी अनजान न थे.
अप्रैल -जून १९७४ की 'आलोचना ' में नामवर सिंह ने उस समय के वामपंथी लेखन की आलोचना करते हुए लिखा -''व्यवस्था विरोध पर विशेष बल देने के कारण यह लेखन वस्तुतः एक विरोधी लेखन की नियति को स्वीकार कर लेता है. जबकि उस का ऐतिहासिक दायित्व शासकवर्ग के साहित्य के विकल्प में एक उच्चतर साहित्य का प्रतिमान प्रस्तुत करना है. ''
क्या इस का यह अर्थ नहीं है की लेखक अगर व्यवस्था विरोध पर विशेष बल देता है तो वह वह एक निम्नतर साहित्य रचता है. लेकिन अगर वह उच्चतर साहित्य का प्रतिमान प्रस्तुत करने पर बल देता है है तो व्यवस्था में बदलाव की उम्मीद की जा सकती है.
सवाल है, क्या व्यवस्था विरोध पर, व्यवस्था में बदलाव के संघर्ष पर, बल दिए बगैर उच्चतर साहित्य का सृजन संभव है ?
'इतिहास और साहित्य का इतिहास ' निबंध में राजेन्द्र कुमार ने लिखा है- '' इतिहास किसी का भी हो , वह व्यक्तिगत विकास का नहीं , सामाजिक विकास की बहिरंतर सरणियों का प्रत्यक्षीकरण कराता है. इसलिए साहित्य का इतिहास अंततोगत्वा सामाजिक इतिहास भी होना चाहिए. ''
समाज और साहित्य के द्वंदात्मक रिश्ते प् र दो मार्क्सवादी आलोचकों के दृष्टियों में बलाघात का अंतर स्पस्ट है.
कुमार का बुनियादी सूत्रीकरण यह है-''समाज के पुनर्निर्माण की इच्छा का ही प्राथमिक रूप है अनुभव का पुनर्निर्माण. अनुभव का पुनर्निर्माण ही अनुभव के अपूर्व होने की शर्त है. '' अनुभव का पुनर्निर्माण मुक्तिबोध के संकल्प ' जीवन की पुनर्रचना ' से भिन्न नहीं है. कुमार का आलोचकीय संघर्ष मुक्तिबोध की परम्परा में है. प्रतिबद्धता के यांत्रिक उपयोग पर उन की तमाम वाजिब आपत्तियों के बावजूद . प्रतिबद्धता के बावजूद में सवाल प्रतिबद्धता पर नहीं , उस की यांत्रिकता पर है. कुमार लेखक से संघर्ष की मुद्रा नहीं , चेतना की मांग करते हैं.
'साहित्य में संघर्ष के स्थिति ' में वे पूछते हैं-''ये लोग यह समझने की कोशिश क्यों नहीं करते की संघर्ष -चेतना का सच्चा और खरा साक्ष्य वही रचना दे सकती है जिस में संघर्ष की स्थिति भावात्मक नहीं, बल्कि भाव की भी स्थिति संघर्षात्मक हो ?''
यह समझने की कोशिश की जाती तो समकालीनता का सौंदर्यशास्त्र कुछ अलग होता. उस में केन्द्रीय स्थित संघर्ष की होती, बचाव की नहीं . इस आखिरी बात को और स्पस्ट करने के लिए , महज़ एक उदाहरण के बतौर, एक लब्धप्रतिष्ठ समकालीन कवि की यह प्रसिद्द और सुन्दर कविता यहाँ दी जा रही है -' प्रत्येक आवाज़ खटका है '

प्रत्‍येक आवाज खटका है
बच्‍चे का मॉं! कहकर पुकारना
खत्‍म होती हरियाली में
बीज से अंकुर का निकलना
खाली मुट्ठी में बंद हवा का छूटकर
जमीन पर गिरना खटका है.
पानी पीना और रोटी चबाना भी.

बचाओ! बचाओ!! चिल्‍ला सकने वाले लोग
बचाओ भी नहीं चिल्‍लाते
कोई बचा है
यह पूछने वाला भी नहीं बचेगा
लगता है दुनिया को नष्‍ट करने का धमाका
अभी शायद हो
हो सकता है जिंदगी को नष्‍ट करने के धमाके के पहले
जिंदगी का बड़ा धमाका हो.

Sunday, December 12, 2010

क्या शताब्दियाँ स्मृति से भी अधिक विस्मृति का वितान रचती हैं?

इस शताब्दी -समय में


हिंदीजगत में महाशताब्दियों की धूम शुरू हो चुकी है. अगला साल फैज़, अज्ञेय , शमशेर , केदार और नागार्जुन की जन्म शताब्दी का साल है.कवीन्द्र रविन्द्र की डेढ़सौंवी जयन्ती है. लेखों , किताबों , गोष्ठियों , समारोहों का सिलसिला चल पडा है.इस सिलसिले में राज-प्रतिष्ठान भी शामिल हैं और प्रतिरोधी लेखक- संगठन भी.
जरूरी है सांस्कृतिक स्मृति को जीवित रखना. तारीखें इस में मददगार होती हैं.
लेकिन याददाश्त की विडम्बना यह है कि जो याद होते हैं , वही याद आते हैं.अगले बरस ही मजाज़ , गोपाल सिंह नेपाली और आरसी प्रसाद सिंह की शताब्दियाँ भी हैं.और यह साल , जो बीत चला है, भुवनेश्वर की जन्म शताब्दी का साल है.
भुवनेश्वर को याद किया उन के जन्म के शहर शाहजहांपुर ने . शाहजहांपुर के बाहर भुवनेश्वर को कितना याद किया गया ?हिंदी समाज को भुवनेश्वर की याद क्यों न आयी ?क्या इस लिए कि याद करना उन्हें जीते जी भुला देने के सांस्कृतिक अपराधबोध को पुनर्जीवित करना होता ?भुवनेश्वर जैसी प्रतिभाएं किसी भाषा समाज में इक्की दुक्की ही होती हैं .' ताम्बे के कीड़े ' ,'स्ट्राइक ' जैसी एकांकियों और ' भेड़िये ' जैसी कहानी के इस लेखक के पास यथार्थ की जैसी भावुकताहीन आलोचनात्मक संरचना थी , वह आज भी दुर्लभ है .क्या वे भुला दिए जाने लायक हैं?क्या उन्हें भुलाया जा सकता है ? भुवनेश्वर और मजाज़ जैसी प्रतिभाओं की याद हमें शताब्दी- उत्सवों पर दुबारा गौर करने का एक मौक़ा फराहम करती है.
क्या शताब्दियाँ स्मृति से भी अधिक विस्मृति का वितान रचती हैं?क्या चंद चुने हुओं को याद करना उन बाकियों को भुला देना है जो चुने नहीं गए ? यह चुनाव कौन करता है ?कौन तय करता है कि स्मरण के शोर में किन आवाजों को बिना किसी आह्ट के डूब जाने देना है ?ये सवाल मजाज़ को फैज़ से और अज्ञेय को भुवनेश्वर से भिड़ा देने के लिए नहीं है.बात यह है कि हर चुनाव जितना दाखिल करता है , उस से कही अधिक खारिज करता है.यह चयन प्रक्रिया की प्रकृति है, केवल परिणति नहीं.

चयन कैननाइज़ेशन है. साहित्य संस्कृति की दुनिया में यह एक स्वाभाविक बात समझी जाती है.
बाख्तिन ने बताया था-'' कैननाइज़ेशन साहित्य की सभी विधाओं की एक ऐसी प्रवृत्ति है जिस में अस्थायी मानकों और पद्धतियों का इस तरह स्थिरीकरण किया जाता है कि वे स्थाई जान पड़ती हैं और तब मूल्यांकन भी संस्कृति और समय की सापेक्षता में नहीं दिखाई पड़ते , देशकालनिरपेक्ष प्रतीत होते हैं.''
संकट यही है.अस्थायी मूल्यों का स्थायीकरण.
निस्संदेह रवींद्रनाथ ने सांस्कृतिक युग -परिवर्तन किया था. अज्ञेय एक नया सौन्दर्य - बोध ले कर आये थे , जिस की एक अपरिहार्य ऐतिहासिक अर्थवता थी . एक ऐतिहासिक सांस्कृतिक प्रक्रिया में उन्होंने अपनी भूमिकाएं प्रभावशाली ढंग से निभाईं.
लेकिन उन के समय में भी , अनंतर भी , कुछ उन से सीखते हुए तो कुछ सीख लेते हुए , कुछ साथ चलते तो कुछ लड़ते- झगड़ते भिन्न प्रकार की सांस्कृतिक दृष्टियाँ उभर कर आयीं. उन में से कुछ ने अपने अलग कैनन भी बनाए.लेकिन कैनन तो कैनन है.वह दाखिल खारिज के सिद्धांत पर ही खडा होता है.वह जब भी बनता है,जितना बचाता है , उस से अधिक मटियामेट कर देता है.
कैननाइज़ेशन सांस्कृतिक जीवन्तता का विलोम है. वह मूल्यों का एक चौखटा बनाता है.सांस्कृतिक गतिशीलता को ठप्प कर के ठस्सपन की संस्कृति को बढ़ावा देता है. जनरुचि को कीलित करता है. अधिकाँश पढ़े- लिखे भी वही पढ़ते- लिखते हैं, जो पाठ्य -पुस्तकें पढ़ाती हैं.पाठ्य - पुस्तकों की तरह स्मृति -उत्सव भी कैननाइज़ेशन की प्रक्रिया में शामिल होते है.वे 'अज्ञेय' को बचाते हैं और भुवनेश्वर को अज्ञेय बना देते हैं.उन के अपने समय के लिए और आने वाले समयों के लिए भी.
कैननाइज़ेशन सांस्कृतिक प्रक्रिया उतनी नहीं है जितनी राजनीतिक कार्रवाई है. यानी जनरुचि को निर्देशित और निर्धारित करने का उद्यम .राजनीतक सहमति और सहनशीलता के उत्पादन का औजार. राजनीतिक अनुकूलता केवल डंडे के जोर से या प्रचार और प्रोपेगैंडा की बदौलत ही नहीं हासिल की जा सकती. अधिक सहज और टिकाऊ वह तब होती है ,जब वह सांस्कृतिक अनुकूलन के जरिये हासिल की जाती है. सांस्कृतिक मुख्यधारा राजनीतिक मुख्यधारा को मजबूत बनाती है. यही कारण है कि कैनन बनाने में व्यवस्था के मुसाहिबों की सब से ज्यादा दिलचस्पी होती है.

कैनन सांस्कृतिक अनुकूलन का काम मुख्यतः तीन चरणों करता है.एक तो वह रूचि के दायरे को सीमित करता है. वह 'महत्वपूर्ण ' और 'सुन्दर ' की एक संशयमुक्त स्पस्ट अवधारना प्रस्तुत करता है. ' महानता' को परिभाषित करता है. इस परिक्षेत्र या दायरे को पार करना कठिनतर होता जाता है.इस सुगढ़ सीमांकन के जरिये संदिग्द्ध प्रतीत होने वाली रुचियाँ जनक्षेत्र से बाहर धकेल दी जाती हैं. इस पहले चरण को परिसीमन कहा जा सकता है.
दूसरे, और यह अधिक बारीक काम है, वह चुने गए सांस्कृतिक प्रतीकों और व्यक्तित्वों को भी एक विशिष्ट अर्थ प्रदान करता है. एक सांस्कृतिक प्रतीक , चाहे वह कोई वस्तु हो या व्यक्ति, एक से अधिक अर्थो का प्रतिनिधित्व करता हो सकता है.उस में जटिलताये और नवीन व्याख्याओं की संभावानाएं हो सकती हैं. कैनन इन जटिलताओं और सम्भावनाओं को संपादित करता है. वह उन्हें एक सरल और सुविधाजनक अर्थ प्रदान करता है. उदाहरण के लिए भगत सिंह जैसे क्रांतिकारी चिन्तक को देशभक्ति के प्रतीक में घटाया जा सकता है.तिरंगे झंडे के रंगों की व्याख्या , उन के ऐतिहासिक विकासप्रक्रिया को भुला कर, बहुसंख्यक समुदाय की साम्प्रदायिक चिह्नों के सन्दर्भ में की जा सकती है. ' हम होंगे कामयाब' को उदारीकरण का मार्चिंग सॉंग बनाया जा सकता है. होने को यह भी हो सकता है कि त्रिलोचन को साक्षरता का संदेशवाहक और नागार्जुन को हरितक्रान्ति का हिरावल बना दिया जाए. अज्ञेय को व्यक्तिवाद का प्रतीक लगभग बनाया ही जा चुका है.इस प्रक्रिया को विशिष्टीकरण कहा जा सकता है.
तीसरा चरण सब से ज्यादा बारीक है. यह सांस्कृतिक प्रतीकों से समाज के रिश्ते को अपनी जरूरत के हिसाब से डिजाइन करना है. जैसे ही कोई वस्तु या व्यक्ति कैनन में शामिल होता है, समाज से उस का जीवंत रिश्ता ख़त्म हो जाता है. वह समाज की ज़द में नहीं रह जाता. अब आप उस से जब जैसे चाहें बोल- बतिया नहीं सकते, लड़ झगड़ नहीं सकते , परस्पर एक दूसरे को बदल नहीं सकते. समाज की बनायी हुयी चीज , धरती पर पला बढ़ा इंसान , उन से छीन कर स्वर्ग को दे दिया जाता है. वह लगभग किसी स्वर्गीय वस्तु या देव - प्रतिमा में बदल जाता है. यह दिव्यता धरती पर खड़े मनुष्य से उस के संवाद को तो कठिन बनाती ही है, खुद मनुष्य को एक आराधक या दर्शनार्थी में बदल देती है. उत्पादकों का समाज मूकदर्शकों की मंडली में बदल जाता है.इस मूकदर्शक का सांस्कृतिक व्यवहार वैसा ही होता है, जैसा टी वी दर्शकों का होता है. वह आनंदित होता ही , ऊबता है, लेकिन न तो हस्तक्षेप के सकता है, न टी वी ऑफ कर पाता है. इस चरण को प्रतिमाकरण अथवा दैवीकरण कह सकते हैं.

सवाल असल में यह है कि क्या उत्सव के होहल्ले में इन सवालों पर गौर करने का समय बचा है.कोई तर्क कर सकता है , जैसे व्यवस्था अपने कैनन बनाती है , वैसे ही व्यवस्था बदलने वालों को भी अपने कैनन क्यों नहीं बनाने चाहिए . क्या इसी तरीके से स्थापित कैननों को चुनौती देने की जरूरत नहीं है. क्या प्रतिरोध के सांस्कृतिक प्रतीकों की रचना नहीं की जानी चाहिए. इस सवाल के किसी सुलझे हुए जवाब तक पहुँचने के लिए कैननाइज़ेशन की प्रक्रियामात्र के सांस्कृतिक राजनीतिक- अभिप्रायों पर ध्यान देना जरूरी है. जरूरी है स्मरण के शोर में छुपी हुयी विस्मृति की मौन गर्जना को सुनने की कोशिश करना.

शताब्दी - समय में यह जरूरी काम भी हो जाए तो क्या बुरा हो !



Thursday, January 28, 2010

खून की नदी में ताजा गुलाब [गोरख पांडेय की पुण्यतिथि पर ]

गोरख पाण्डेय की अनेक पंक्तियाँ लोक स्मृति का हिस्सा बन चुकीं हैं. वे हमारी चेतना में हमेशा जीवित रहतीं हैं. हम जिन्दगी को जिन रंगों रूपों में पहचानते हैं, वह पहचान ऐसी ही पंक्तियों के उजाले में बनती है.कविता इसी तरह जिन्दगी का हिस्सा बनती है.' आँखें देख कर' एक ऐसी ही कविता है.

" ये आँखें हैं तुम्हारी
तकलीफ का उमड़ता हुआ समुन्दर
इस दुनिया को
जितनी जल्दी हो
बदल देना चाहिए."
कुल कविता यही एक वाक्य है. यहाँ एक भी अतिरिक्त शब्द जोड़ना उस बेचैनी को हल्का कर देना होगा, जो दुनिया बदल देने के लिए जरूरी है .कितनी सुन्दरता होगी उन आँखों में ,जिन में दुनिया भर की ये तकलीफें न होंगी. इस कविता के उजाले में हम उस अदृश्य सुन्दरता को देख पातें हैं , जो अभी तकलीफ के पर्दों में छुपी हुयी है.जीवन की सुन्दरता का जो संकेत इस कविता में है , वही इसे कालजयी बनाता है. इस कविता की विचलित कर देने वाली बेचैनी का यही रहस्य है.
.
'हमारी यादों में छटपटातें हैं
कारीगर के कटे हाथ
सच पर कटी जुबानें चीखतीं हैं हमारी यादों में
हमारी यादों में तड़पता है
दीवारों में चिना हुआ
प्यार!
अत्याचारी के साथ लगातार
होने वाली मुठभेड़ों से
भरे हैं हमारे अनुभव .
यहीं पर एक बूढा माली
हमारे मृत्युग्रस्त सपनों में
फूल और
उम्मीद रख जाता है.' [फूल और उम्मीद]
अछ्छी कवितायें अपने समय का दृश्य लिखतीं हैं. सब से अछ्छी कवितायें वह भी लिखतीं हैं, जो अदृश्य है, लेकिन है.
जीवन यातनामय है . लेकिन यातना जीवन नहीं है. जीवन है यातना के बावजूद उम्मीद. अँधेरे हैं , अत्याचार है, कुरूपताएं हैं , लेकिन यही अंतिम सच्चाई नहीं है.इन से बड़ी सच्चाईयां हैं- उजाला, प्यार और सुन्दरता . सपने और उम्मीदें. इन सच्चाईयों का भरोसा ही संघर्ष के संकल्प को जन्म देता है और ज़िंदा रखता है.गोरख के यहाँ प्यार और जिन्दगी की सुन्दरता ही कविता की बुनियाद है. जिन्दगी इतनी सुन्दर और प्यारी है , इसी लिए उन स्थितियों को समझना और उन को बदलने के लिए लड़ना जरूरी है, जो उसे बदसूरत बनाती हैं.गोरख की कविता जाती तौर पर सौंदर्य और संघर्ष की कविता है.उनकी कविता में हर जगह जहां यातना है, वहीँ उम्मीद भी है .जहां अत्याचार है , वहीँ प्यार भी है, जहां कुरूपताएं हैं , वही सुन्दरता भी है.' खून की नदी' कविता में राजकुमारी और उसे गुलाब के फूल भेंट करने वाले माली को मार दिया जाता है, लेकिन "माली की आत्मा आज भी/राजकुमारी को / ताजा गुलाब के फूल भेंट करती है/जो धारा में तैरते चले जाते हैं ."कविता का अंत यों होता है-
"हमारे गाँव की पीढ़ी-दर-पीढ़ी यादों के
धुंधले किनारों से हो कर
खून की नदी बह निकलती थी
जिस में गुलाब के ताजा फूल तैरते थे."
खून की नदी में ताजा गुलाब. मनुष्यता के इतिहास को शायद ही इस से अधिक सशक्त बिम्ब दिया जा सके.
गोरख एकाकी अवसाद या इकतरफा आह्लाद के कवी नहीं हैं. न विरुद्धों के सामंजस्य के.वे उस संघर्ष के कवी हैं जो जीवन और जीवन-विरोधी स्थितियों के बीच हमेशा जारी रहता है. उनकी कविता अनुभूति की प्रामाणिकता तथा कला की स्वायत्तता की मांग करने वालों का प्रत्याख्यान तो करती ही है,आक्रोश की अराजकता तथा सामंजस्य की समकालीनता से भी सीधी मुठभेड़ करती है .

'स्वर्ग से विदाई गोरख' की अंतिम कविताओं में से है.इस कविता में एक इमारत है जो स्वर्ग जैसी आलिशान और सुविधा संपन्न है. इमारत बन कर खडी हो गयी है और अब मालिकान उन मजदूरों को वहाँ एक क्षण भी रुकने नहीं देना चाहते, जिहोने अपनी मेहनत और कारीगरी से उस का निर्माण किया है.स्वर्ग से कामगारों की विदाई एक ऐसा मोटिफ है जो गोरख की कविताओं में बार बार आता है. आज दुनिया में जो स्वर्ग सरीखी सुख सुविधाएँ मौजूद हैं, वे हजारों बरस की इतिहास यात्रा में मेहनतकश हाथों से निर्मित की गयीं हैं.लेकिन उन्ही मेहनतकशों को उस स्वर्ग से बेदखल कर दिया गया है. यह मनुष्य का उस की सृजनात्मकता से यानी उस की मनुष्यता से अलगाव है.यही मनुष्य की सबसे बड़ी यातना और अपमान है. सामंतो और पूंजीशाहों ने मनुष्य के बनाये स्वर्ग को छीन कर उसे नरक में धकेल दिया है.
ध्यान गए बगैर नहीं रहता की गोरख के यहाँ मनुष्यता का यह अलगाव और अपमान जहां सब से अधिक मूर्त है, वह है स्त्री का जीवन. घर भी एक स्वर्ग है जिसे स्त्री ने अपने खून पसीने से बनाया है. लेकिन इसी घर में वह नरक भी है जहाँ वह एक कैदी की तरह जिन्दगी बसर करती है.घर हो चाहे दुनिया हो , स्वर्गों पर काबिज लोगों ने सच्चे निर्माताओं को नरक में डाल रखा है. लेकिन इस नरक के रहते क्या वे खुद भी सुखी रह सकते हैं?क्या वे खुद भी दण्डित नहीं हैं?गोरख की कविता के पास यह दुर्लभ अंतर्दृष्टि है की सत्ता और पितृसत्ता का का व्याकरण एक है, तर्क एक है और नियति भी एक है
.घर घर में फांसी घर हैं
घर घर में दीवारें हैं
दीवारों से टकरा कर
गिरती है वह
गिरती है आधी दुनिया
सारी
मनुष्यता गिरती है
हम जो ज़िंदा हैं
हम सब अपराधी हैं
हम दण्डित हैं.

इस दंड से मनुष्यता की मुक्ति कैसे होगी?शायद उस मुक्ति संग्राम की अगली कतारों में भी स्त्रियों को ही होना होगा. 'कैथर कला की औरतें' कविता ठीक इसी सम्भावना को सेलिब्रेट करती है.इन जुझारू औरतों के गोल में वह किशोरी भी शामिल है , 'जिसे सात सुरों में पुकारता है प्यार ', जिसने महल अटारी का पत्थर बन जाने की जगह साफ़ कह दिया है की 'मां , मैं जोगी के साथ जाउंगी.'गोरख की कविता में प्यार करना और अन्याय के खिलाफ लड़ना दोनों अपनी मनुष्यता को रिक्लेम करने की एक ही जीवन प्रक्रिया के हिस्से हैं.
सूतल रहलीं सपन एक देखलीं
सपन मनभावन हो सखिया
.............
गोसयाँ के लाठिया मुरइया अस तुरलीं
भगवलीं महाजन हो सखिया
......
बयिरी प्इस्वा के रजवा मेटवलीं
मिलल मोर साजन हो सखिया .

Tuesday, January 26, 2010

संस्कृति के जंगलों में

प्रमोद वर्मा स्मृति सम्मान समारोह में कवि चंद्रकांत देवताले भी मौजूद थे .लौटे तो एक कविता लिखी.इस कविता से एक दो पंक्तियाँ नहीं निकाली जा सकतीं .पूरी कविता इस प्रसंग में चल रही समूची बहस के मर्म को समझने और भीतर तक महसूस करने के लिहाज से इस बीच लिखी गयी टिप्पणियों से कहीं अधिक मूल्यवान है.उसे तीस अगस्त दो हज़ार नौ के रविवारी जनसत्ता में पढ़ा जा सकता है .यहाँ कुछ अंश पेश हैं .
माना हवाई अड्डे पर

कौन जाने किस दुःख को गाड़ कर
उजाड़ में आ रही थीं हवाएं
तेरह जुलाई की सुबह रायपुर के माना हवाई अड्डे पर
झमाझम के बीच सोचता हूँ
अगर मुक्तिबोध होते तो क्या कहते

मैं किसी पर अंगुली नहीं उठा रहा
गड़ा रहा हूँ अपने ही कलेजे में
एक कवि जो कभी नहीं मरता
याद आता है हमेशा बुरे वक़्त में ...........

..........फिर बुदबुदाने लगा आप से आप
मृतकों की सत्यासत्य विवेचना
संभव नहीं है स्तुतियों से
और मुखासीन-पीठासीन-पहुंचे हुए
जीवितों पर संदेह के सिवा
कुछ नहीं किया जा सकता
इस बाजारू समय में.......

.....छूट रही है नीचे धरती धान कटोरे वाली
इन दिनों रक्तरंजित
जंगल और जीवन में बेशकीमती
धडकता-गूंजता..तहस-नहस-हो रहा यहाँ
सोच रहा कौन किस को धोखा दे रहा
सचमुच फर्क करना मुश्किल
एक दूसरे में प्रवेश कर रहे
चेहरे हितैषियों और हत्यारों के.....

विश्व रंजन और खगेन्द्र ठाकुर उस समारोह में आने वालों की सूची में देवता ले के नाम की भी नुमाइश करते हैं.लेकिन कवि के ह्रदय में इस शिरकत को ले कर संशय का जो हा हा कार है ,उस की छाया भी प्रमोद वर्मा के इन हितैषियों के वक्तव्यों में नज़र नहीं आती.इस प्रसंग में श्रीकांत वर्मा का नाम भी लिया गया है .श्रीकांत अपने राजनीतिक गुनाहों के बावजूद बेशक बड़े कवि हैं .'मगध ' की कविताओं में संशय जिस छट पटाती हुयी प्रश्न-विकलता में बदल कर अपने समय से मुठ भेड़ करता है, उस के स्रोत कहाँ हैं?वे जीवन और कला के उन जटिल अंतर्संबंधों में हैं ,जिन की ओर से आँख मूँद लेने की सिफारिश हिंदी के नामवर लेखकों की ओर से की जा रही है.कहा जा रहा है , कौन कहाँ जा रहा है ,किस से क्या पा रहा है , यह सब निरर्थक बहसें हैं.बहस केवल रचना पर होनी चाहिए .

केवल रचना पर! अधिरचना पर नहीं ! रचना पर या महज़ रचना कौशल पर ? बकौल मुक्तिबोध प्रत्येक रचना किसी जीवन समस्या से जन्म लेती है . जीवन समस्या का रिश्ता आधार से होता है और अधिरचना से भी.रायपुर समारोह की सब से बड़ी उपलब्धि यह रही की बहस रचना से अधिरचना तक चली गयी .'सांस्कृतिक सलवा जुडूम' से लेकर सांस्कृतिक संगठन तक बहस के दायरे में आ गए . साहित्य अकादमी के सामसुंग टैगोर पुरस्कारों के प्रसंग में विष्णु खरे ने लिखा की यह भी सांस्कृतिक सलवा जुडूम है . रायपुर में हो चाहे दिल्ली में, इन प्रायोजनों का मकसद इस के सिवा और क्या है की लेखकों को लेखकों से भिडाओ .जिन्हें पीटना है , उन्हें बिरादरी से ही पिटवाओ.जब तक वे सब के सब विपक्ष में रहेंगे , एक साथ एक सुर में सत्ता के खिलाफ चीखते पुकारते रहेंगे. एक सुर एक राग गड़बड़ है अगर वह पंचम सुर में राग दरबारी नहीं है. उस में फांक पैदा करो. टुकड़े फेंको, टुकड़े. फिर देखो क्या मार होती है.विरोध किस तरह सहमतियों की सांस्कृतिक बहुलता और विचारों के संसदीय जनतंत्र में बदल कर हां हां हुआँ हुआँ हो जाता है.

जो टुकड़खोर नहीं हैं , उन को काउंटर करने के लिए एनकाउन्टर स्पेशलिस्ट हैं , न! आयोजन समितियों से लेकर चयन समितियों तक में छाये हुए.

सरकार लेखकों को लड़ाने के लिए निजी एजेंसियों की शरण में जा रही है तो निजी एजेंसियां सरकारों को लड़ा देने के ख्वाब सजा रहीं हैं.आइ आइ पी एम् के अरिंदम सेन ने महाश्वेता देवी , मेधा पाटकर , ममता बनर्जी और खुद के लिए मानवता विका स पुरस्कारों की घोषणा .की है.ये पुरस्कार बंगाल में स्टालिनवाद के उन्मूलन के लिए दिए जा रहें हैं .अरिंदम सेन महाश्वेता को पुरस्कृत करें , यह वैसे ही है जैसे रमण सिंह नामवर सिंह को पुरस्कृत करें साहित्य में विचारधारा की तानाशाही का मूलोच्छेद करने के लिये.

पुरस्कारों के राजनीतिक निहितार्थ हों, यह कोई नयी बात नहीं. नयी बात है संस्कृति और मानवाधिकार के इलाके का नया महत्व.विश्वरंजन का मौलिक योगदान यह है की उन्होंने नक्सल विरोधी अभियान के सन्दर्भ में इस महत्व को समझा है .उन्होंने बार बार कहा है -' नक्सली दस्तावेजों से साफ जाहिर होता है कि उनके एजेंट बहुत सारे प्रजातांत्रिक आंदोलनों और संगठनों (जिन्हें वे आंशिक आंदोलन कहते हैं) में भी घुसपैठ कर चुके हैं जहां की सोंच को वो धीरे-धीरे विकृत करेंगे जनयुद्ध के निर्णायक दौर के समय इस्तेमाल करने के लिए । पर इस लड़ाई में हमें सभी स्तरों पर लड़ना होगा।' [छत्तीसगढ़ अखबार में १५ सितम्बर २००७ को प्रकाशित विश्वरंजन का आलेख .]

'सभी स्तरों पर लड़ना होगा।' सलवा जुडूम एक स्तर है, सांस्कृतिक सलवा जुडूम दूसरा .इस ख़ास परिदृश्य को ध्यान में रखे बगैर संस्कृति मंचों की भूमिका और प्रासंगिकता को लेकर बहस करना बेमानी है.

अभी ''वाक्' में प्रकाशित कुछ लेखों में बहस उठायी गयी है की जमाना बदल चुका है. ये संचार क्रांति और नए मीडिया के दिन हैं. इस जमाने में व्यक्ति का महत्व बढ़ा है, जब की संगठनों की भूमिका खत्म हो चली है.ऐसे में वाम लेखक संगठन भी रीतिकालीन हो चलें हैं. वहाँ घिसीपिटी विचारधाराओं के रीतिकाल चल रहें हैं.निरा पिष्टपेषण चल रहा है, नया कुछ होने हवाने की गुंजाइश नहीं रही.उत्तर-आधुनिक स्थितियां हैं जिन में शब्दों के अर्थों का अनर्थ हो चुका है.लोकतंत्र, धर्म निरपेक्षता, समाजवाद - ऐसे सभी परमपूज्य आधुनिक शब्द अपनी उलटबांसियों में बदल चुके हैं.इतिहास , साहित्य, लेखक , कर्ता....सब का अंत हो चुका है.ऐसे में लेखक संगठनो के लिए कोई काम हो सकता है , तो वह है, हिंदी के गरीब लेखकों के कल्याण के लिए , उन्हें प्रकाशकों के शोषण से बचाने के लिए , कुछ जन -जागरण करना , चन्दा शंदा करना .लेकिन लेखक संगठन तो यह भी नहीं करते. वे पार्टी के तानाशाहों ,नौकरशाहों और उन के चापलूसों के लिए आत्मोत्थान के साधन मात्र बन कर रह गएँ हैं.वे प्रतिभाओं के उत्पीडन और नकलियों की नक्शेबाजी के अड्डों में बदल चुके हैं.गर अब भी वे अपना भला चाहते हों , तो उन्हें सब से पहले उन राजनीतिक पार्टियों के शिकंजे से मुक्त हो जाना चाहिए , जिन से वे नाभिनालबद्ध हैं.

ये बातें लेखक ने केवल सैद्धांतिक आधार पर नहीं कहीं हैं. एक ख़ास लेखकसंघ में काम करने के अपने अनुभवों के आधार पर भी कहीं हैं,सब जानते हैं की एक अन्य लेखकसंघ के बारे में भी मिलती जुलती बातें उस के अनेक सदस्यों की ओर से कही गयीं हैं . कई लेखकों ने इस्तीफे भी दिए हैं. वाम संस्कृति का जो तीसरा मंच है, उस पर भी एक पुराने सदस्य ने ऐसे ही आरोप लगाये थे , जब उस से रायपुर समारोह में शामिल न होने के मंच के फैसले के खिलाफ जाने के लिए स्पस्टीकरण माँगा गया था .

सांस्कृतिक संगठनों में पार्टियों की तानाशाही का एक नमूना देखें . भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के मनीष कुंजम छतीसगढ़ में सलवा जुडूम के खिलाफ आवाज उठाते रहें हैं. वे माओवादी हिंसा की भी आलोचना करते हैं और स्थानीय संसाधनों की कार्पोरेट हड़प लीला की भी.उन की जान पर दोतरफा ख़तरा है. विश्वरंजन के सिपाही उन्हें नक्सली करार दे कर उन का उत्पीडन करते हैं.सरकार ने उन के एकमात्र सुरक्षा गार्ड को भी हटा दिया है. लेकिन प्रगतिशील लेखक संघ , जिसे भाकपा से नाभिनालबद्ध बताया जाता है , विश्वरंजन के समारोहों में शामिल हो कर गौरवान्वित महसूस करता है. क्या आज वामपंथी पार्टियां खुद इस हालत में हैं की वे सांस्कृतिक संगठनों पर पर स्तालिनवादी किस्म का नियंत्रण कायम कर सकें?आज असली संकट पार्टियों की तानाशाही नहीं,बल्कि यह है की पार्टियाँ और जन संगठन एक दुसरे से इस कदर स्वायत्त हो गएँ हैं की बाएं हाथ को पता ही नहीं की दाहिना हाथ क्या कर रहा है.अचरज यह है की जिन्हें सारी दुनिया की उलटबांसियां दिखाई दे रहीं हैं , उन के लेखे केवल भारत की वामपंथी पार्टियाँ अपने शुद्ध शाश्वत शाश्त्रीय रूप में बची हुयी हैं!

अब सूचना- संचार- मीडिया क्रांति पर दो एक बातें. समझदारों का कहना है की इस क्रांति ने जनतांत्रिक अवकाश का अभूतपूर्व विस्तार किया है.जेसिका, आरुशी , रुचिका के मामले ज़िंदा हैं तो इसी क्रांति के बदौलत. इंटरनेट तो शायद आग के बाद मानवजाति का दूसरा सब से महत्वपूर्ण आविष्कार है .यह तो मैं अपने निजी अनुभव के आधार पर भी कह सकता हूँ की इंटरनेट ने खुद मेरी जिन्दगी को जितना बदल दिया है , उतना न न्यूटन के गुरुत्वाकर्षण ने बदला था , न आइनस्टीन के सापेक्षतावाद ने. जरूरी जानकारियों के लिए आज न मुझे सरकार का मुंह देखना है न निजी चैनलों का. आप सब से सुख दुःख की दो बातें करने के लिए भी मुझे न किसी सेठ का मुंह देखना है , न किसी जेठ का.

तो जेसिका , आरुशी , रुचिका को न्याय मिल जाएगा न? और निठारी के नरपिशाचों को भी?मोदी , आडवाणी , वाजपायियों को? मनमोहन , सोनियों , राहुलों को ? लालुओं , मुलायमों . ममताओं , बुद्धदेवों को ?बुशों , ब्लेअरों , ओबामाओं को? ? कम से कम मुझे तो ऐसी उम्मीद नहीं. तकनीक अन्तःतः ताकतवरों की ही सेवा करती है. ज्ञान और विचारधाराएँ भी. लोकतंत्र सब से अधिक साम्राज्यवाद के ही काम आया न ?यहाँ तक की मार्क्सवाद भी? और उत्तराधुनिकतावाद?

इंटरनेट इस समय पूँजी का सब से बड़ा अखाड़ा है. संस्कृति सहमतियों के उत्पादन का औजार पहले भी थी . आज तकनीक ने उसे एक ऐसी ताकत मुहैय्या कर दी है जो पहले कभी मुमकिन न था.चौबीस घंटों के न्यूज चैनल किस संस्कृति का निर्माण कर रहे हैं?व्यक्ति ताकतवर हुआ है या इतिहास के इसी दौर में सब से अधिक अकेला? सांस्कृतिक सलवा जुडूम के लिए जिस जंगल की जरूरत है, उसे पूँजी , तकनीक और सूचना विस्फोट के इस नए जमाने ने ही जन्म दिया है.

हाँ , प्रतिरोध की ताकतें भी इस तकनीक क्रांति के लाभ ले सकतीं हैं . जैसे की वे पहले भी ले सकतीं थीं. लेकिन ऐसा वे तभी कर सकतीं हैं , जब वे संगठित हों. जैसा की जन संस्कृति मंच के महासचिव प्रणय कृष्ण ने मंच के पिछले सम्मलेन में चेताया था, पूँजी की ताकत का मुकाबला केवल संगठन की ताकत से किया जा सकता है!

इस लिए आज संगठनों की तमाम कमजोरियों का इलाज यह नहीं है की उन्हें दफना दिया जाय .जरूरत यह है की उन पर भरपूर बहस की जाय , बीमारियों का सही निदान किया जाय, ताकि संगठन ठीक तरीके से वह काम कर सकें जो केवल वही कर सकते हैं. आज जब संस्कृति की लड़ाई अपने सब से अधिक खतरनाक और नाजुक दौर में है , तब सांस्कृतिक संगठनों को ही प्रतिरोध के अगुआ दस्तों के रूप में काम करना है. क्या हम भूल गए की पिछले दो दशकों में इस देश में प्रतिक्रया का जो पुनरुत्थान हुआ है उस का नेतृत्व एक ऐसे संघ ने किया है जो अपने को एक सांस्कृतिक संगठन कहता है?

आज हिंदी के वामपंथी लेखकों के बीच दो तरह के आत्मघाती विचार चलन में है. एक तरफ वे हैं , जो हर बहस को बेवफाई करार दे रहे हैं. दूसरी तरफ वे हैं जो बेवफाई को ही आज की विचारधारा बता रहें हैं.अब आप ही यह तय करें की आप किस ओर हैं!

Monday, January 18, 2010

कहते हैं तब शहंशाह सो रहे थे

'कहते हैं तब शहंशाह सो रहे थे ' उमाशंकर चौधरी का कविता संग्रह है.भारतीय ज्ञानपीठ से इसका पहला संस्करण सन २००९ में प्रकाशित हुआ है.इस संग्रह में एक कविता है- इस विकसित दौर में . .इस विकसित दौर में चारो ओर विकास की चर्चा है , विकास की दौड़ है .लेकिन खुद विकास शब्द के मायने बदल गए हैं.जैसे एक विकास यह है की ' अब हत्यारों से डरने का वक़्त चला गया है'.कारण यह है की ' ह्त्या , हथियार और हत्यारा अब अंडरवर्ल्ड से ज्यादा बाज़ार के शब्द हैं'. अंडरवर्ल्ड बाज़ार में और बाज़ार अंडरवर्ल्ड में तब्दील हो गया है.बाज़ार इतना ताकतवर हो गया है की उस ने शब्दों से अर्थ छीन लिए हैं और लोगों से उन की आत्माएं .' भीड़ अब देश की ताकत नहीं' में कवी कहता है - 'अब यह भीड़ एक ऐसी भीड़ हो गयी है , जो / धीरे धीरे तब्दील होती जा रही है / उपभोक्ताओं की एक श्रेणी में. और जिसे / तैयार किया है बाज़ार ने / अपनी प्रयोगशाला में अपने मुनाफे के लिए' .'यह एक ठंडी भीड़ है / जिन की आत्माएं मर चुकीं हैं, और जो / निकले हुए हैं सड़क पर दो वक़्त की रोटी और/ एक अदद अवसर के लिए '. अब यह भीड़ न किसी फ़रियाद के लिए जुट रही है, न सत्य के किसी संघर्ष के लिए.'अब यह जुटती है /अन्याय को न्याय साबित करने के लिए/और किसी ताकतवर को अपना नेता चुन ने के लिए.'
बाज़ार की दहशत इतनी ज्यादा है की कवी की निराशा का कोई अंत नहीं है.अगर यह भीड़ अचानक क्रांतिकारी तेवर अपना ले तो क्या होगा ? 'सच कहूँ-/ उन्हें गोली दाग दी जाएगी /और बचे हुए लोगों से छीन लिए जायेंगे /उन के सूक्ष्म अवसर . ' जाहिर है ,ऐसे में मृत्यु निश्चित है.एक अन्य कविता में कवी को यकीन है की 'आप के हर पल सतर्क रहने से भी कुछ नहीं हो सकता /आप की मृत्यु निश्चित है /चूंकि आप जीवित हैं./इस लिए आप की मृत्यु निश्चित है./आप की हत्या ऊपर से ही कर दी जायेगी/और कर क्या दी जाएगी /रोज की जा रही है /और आप को पता भी नहीं चल पाता है'. पता भी कैसे चले , आप की आत्मा तो पहले ही मर चुकी है .लेकिन कवी को सब कुछ पता है .कैसे पता है ?जब सब की आत्माएं मर चुकीं हैं तो उस की ही जीवित कैसे बची हुई है ?
शायद इस लिए की वह कवी है .शायद इसी लिए वह कवी है .वह मृत आत्माओं की भीड़ में शामिल नहीं है .वह इस भीड़ के बारे में कवितायेँ लिखता है .वह इसी भीड़ के लिए कवितायेँ लिखता है .लेकिन वह इस भीड़ का हिस्सा नहीं है.वह इस से अलग है, ऊपर है. इसी लिए तो वह भीड़ लिखता है .जनता नहीं, अवाम नहीं. 'भीड़ अब देश की ताकत नहीं
'
'कुछ कम मनुष्य होता तो ..'कविता में ' मैं' अपनी प्रेमिका से संवाद करता है .प्रेमिका को उस के प्यार पर संदेह है .वह उसे लाख समझाता है की उस के बिना वह कितना अधूरा महसूस करता है .उसे उस की हर शर्त मंजूर है.उसे अपनी सच्चाई पर यकीन है.वह यह भी जानता है की प्रेमिका भी इस सच्चाई को जानती है . मामला बिगड़ता तब है , जब वह अपनी सच्चाई की रु में यह सच भी कबूल करने से नहीं चूकता 'की मैं तुम्हे जितना प्यार करता हूँ/ तुम्हारे गदराये हुए बदन को भी उतना ही प्यार करता हूँ '.प्रेमिका इस पर तिलमिला उठती है.'मैं' कहता है- 'असली सच शायद मैं जानता हूँ/ यदि मैं कुछ कम मनुष्य होता तो/कुछ और दिनों तक, उस के साथ रह पाता.'
असली सच क्या है ?यह मनुष्य जो अपनी प्रेमिका को और उस के 'गदराये बदन ' को एक ही तरह लेकिन अलग अलग प्यार करता है , वह कितना मनुष्य है और अपनी प्रेमिका को कितना मनुष्य समझता है ?पूरी कविता में 'मैं' अपने प्यार का बखान तो करता है , लेकिन प्रेमिका के व्यक्तित्व के बारे में एक शब्द नहीं बताता. हम नहीं जान पाते की उस की भावनाएं क्या है, बुद्धि-विचार क्या है, आदतें कैसीं हैं , पसंद -नापसंद क्या है.सिवा इस के की उस का बदन गदराया हुआ है .साफ़ है की उस के प्यार का आधार गदराया बदन ही है.इसी को वह अपनी अतिरिक्त मनुष्यता समझता है. उसे यकीन है की यदि वह कुछ कम मनुष्य होता तो प्रेमिका उस के साथ रह लेती. यानी प्रेमिका तो है ही कमतर मनुष्य. इस कविता में कवी किस के साथ है?'मैं' के या प्रेमिका के?कवी ने इस कविता में नैरेटर की कुर्सी 'मैं'को ही बख्शी है. वह कम से कम प्रेमिका को भी कुछ अपनी बात कहने का अवसर तो दे ही सकता था.
परेशानी असल में यह है की बाज़ार ने प्यार को भी खराब कर दिया है.'जरूरी है प्यार का बचना'; कविता में कवी पुराने और नए जमाने के प्यार पर विचार करता है. 'अब उस स्थिति की मात्र कल्पना की जा सकती हैकि/ किस स्तर का प्रेम रहा होगाप्रेम करने वाले /उन जोड़ों के बीच जो सिर्फ एक-दुसरे के विश्वास को साथ लेकर /भाग जाते थे इ स समाज से बहुत दूर/ एक अलग दुनिया बसाने के लिए.' अब क्या हो गया है की
लड़के लड़कियों को हिसाब किताब ज्यादा आ गया है.वे 'अपने प्रेम और प्रेम विवाह को /अपने भविष्य की दृष्टि से उठाया गयाकदम साबित करना चाहते हैं.' 'अब प्रेम की ऊंचाई एक-दुसरे के लिए/जीना और मरना नहीं/एक दुसरे केसाथ तरीके से रह जाना भर है.'प्यार का यह नया चलन कवी के मुताबिक़ 'मनुष्य के बर्बर होते जाने' का संकेत है.यानी प्यार में भावुकता और भगोड़ा पन ही मनुष्यता है , जब की जिंदगी की समझदारी बर्बरता है!इस में संदेह नहीं की कवी मनुष्यता का बड़ा प्रेमी है , लेकिन मनुष्यता की उस की समझ खासी चक्करदार जान पड़ती है .
लड़कियां बदल गयीं हैं . 'लड़कियां अब प्यार नहीं चाहतीं /वह टिकने के लिए एक कंधा भी नहीं चाहतीं /वह चाहतीं हैं अब एक ऐसा जीवन साथी जिस के साथ /वह कदम से कदम मिला कर दौड़ सकें .'लकिन लड़कियां यह जो चाहतीं हैं ,उसे प्यार क्यों नहीं कहा जा सकता?

'शहंशाह की नींद' वह कविता है , जिस से संग्रह का शीर्षक लिया गया है.कविता के पहले कवि ने स्वयं उस का सामयिक सदर्भ स्पष्ट कर दिया है.जब सद्दाम हुसैन को फांसी दी जा रही तब बुश सो रहे थे.लकिन बुश अकेले नहीं सो रहे थे. उन के साथ बाकी दुनिया भी सो रही थी. यानी अगर दुनिया सो नहीं रही होती तो इतिहास का यह सब से आपराधिक युद्ध घटित ही न हो सकता था.इस लिए 'अब यह जितना /सभ्यता और संस्कृतियों के टकराव का समय नहीं है /उस से अधिक है यह नींदों के टकराव का.' नींदों के टकराव का या सह-अस्तित्व का?नींदों के टकराव का मुहावरा चौंकाता तो है , लेकिन एक जटिल स्थिति का सरलीकरण भी करता है. दुनिया पर अमरीकी शहन्शाहियत का कब्ज़ा एक सच है तो यह भी सच है की प्रतिरोध भी तब से अब तक अनेक रूपों में जारी है.लेकिन जिस बदले हुए जमाने की खबर देने कवि निकला है, उस जमाने में उसे चंहु ओर अन्धेरा ही अन्धेरा दीख पड़ता है , उस अँधेरे में चकमक की चिंगारियां कही नज़र ही नहीं आतीं.

इस विकसित दौर में बाज़ार के खेल सचमुच निराले हैं .वह शब्दों से अर्थ छीन लेता है और लोगों से उन की आत्माएं.क्या वह कविता से यह अंतर्दृष्टि भी छीन लेता है,की अंततः सब से बड़ा सत्य मनुष्य ही है, न इश्वर. न शहंशाह , न बाज़ार.?.

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