Sunday, December 12, 2010

क्या शताब्दियाँ स्मृति से भी अधिक विस्मृति का वितान रचती हैं?

इस शताब्दी -समय में


हिंदीजगत में महाशताब्दियों की धूम शुरू हो चुकी है. अगला साल फैज़, अज्ञेय , शमशेर , केदार और नागार्जुन की जन्म शताब्दी का साल है.कवीन्द्र रविन्द्र की डेढ़सौंवी जयन्ती है. लेखों , किताबों , गोष्ठियों , समारोहों का सिलसिला चल पडा है.इस सिलसिले में राज-प्रतिष्ठान भी शामिल हैं और प्रतिरोधी लेखक- संगठन भी.
जरूरी है सांस्कृतिक स्मृति को जीवित रखना. तारीखें इस में मददगार होती हैं.
लेकिन याददाश्त की विडम्बना यह है कि जो याद होते हैं , वही याद आते हैं.अगले बरस ही मजाज़ , गोपाल सिंह नेपाली और आरसी प्रसाद सिंह की शताब्दियाँ भी हैं.और यह साल , जो बीत चला है, भुवनेश्वर की जन्म शताब्दी का साल है.
भुवनेश्वर को याद किया उन के जन्म के शहर शाहजहांपुर ने . शाहजहांपुर के बाहर भुवनेश्वर को कितना याद किया गया ?हिंदी समाज को भुवनेश्वर की याद क्यों न आयी ?क्या इस लिए कि याद करना उन्हें जीते जी भुला देने के सांस्कृतिक अपराधबोध को पुनर्जीवित करना होता ?भुवनेश्वर जैसी प्रतिभाएं किसी भाषा समाज में इक्की दुक्की ही होती हैं .' ताम्बे के कीड़े ' ,'स्ट्राइक ' जैसी एकांकियों और ' भेड़िये ' जैसी कहानी के इस लेखक के पास यथार्थ की जैसी भावुकताहीन आलोचनात्मक संरचना थी , वह आज भी दुर्लभ है .क्या वे भुला दिए जाने लायक हैं?क्या उन्हें भुलाया जा सकता है ? भुवनेश्वर और मजाज़ जैसी प्रतिभाओं की याद हमें शताब्दी- उत्सवों पर दुबारा गौर करने का एक मौक़ा फराहम करती है.
क्या शताब्दियाँ स्मृति से भी अधिक विस्मृति का वितान रचती हैं?क्या चंद चुने हुओं को याद करना उन बाकियों को भुला देना है जो चुने नहीं गए ? यह चुनाव कौन करता है ?कौन तय करता है कि स्मरण के शोर में किन आवाजों को बिना किसी आह्ट के डूब जाने देना है ?ये सवाल मजाज़ को फैज़ से और अज्ञेय को भुवनेश्वर से भिड़ा देने के लिए नहीं है.बात यह है कि हर चुनाव जितना दाखिल करता है , उस से कही अधिक खारिज करता है.यह चयन प्रक्रिया की प्रकृति है, केवल परिणति नहीं.

चयन कैननाइज़ेशन है. साहित्य संस्कृति की दुनिया में यह एक स्वाभाविक बात समझी जाती है.
बाख्तिन ने बताया था-'' कैननाइज़ेशन साहित्य की सभी विधाओं की एक ऐसी प्रवृत्ति है जिस में अस्थायी मानकों और पद्धतियों का इस तरह स्थिरीकरण किया जाता है कि वे स्थाई जान पड़ती हैं और तब मूल्यांकन भी संस्कृति और समय की सापेक्षता में नहीं दिखाई पड़ते , देशकालनिरपेक्ष प्रतीत होते हैं.''
संकट यही है.अस्थायी मूल्यों का स्थायीकरण.
निस्संदेह रवींद्रनाथ ने सांस्कृतिक युग -परिवर्तन किया था. अज्ञेय एक नया सौन्दर्य - बोध ले कर आये थे , जिस की एक अपरिहार्य ऐतिहासिक अर्थवता थी . एक ऐतिहासिक सांस्कृतिक प्रक्रिया में उन्होंने अपनी भूमिकाएं प्रभावशाली ढंग से निभाईं.
लेकिन उन के समय में भी , अनंतर भी , कुछ उन से सीखते हुए तो कुछ सीख लेते हुए , कुछ साथ चलते तो कुछ लड़ते- झगड़ते भिन्न प्रकार की सांस्कृतिक दृष्टियाँ उभर कर आयीं. उन में से कुछ ने अपने अलग कैनन भी बनाए.लेकिन कैनन तो कैनन है.वह दाखिल खारिज के सिद्धांत पर ही खडा होता है.वह जब भी बनता है,जितना बचाता है , उस से अधिक मटियामेट कर देता है.
कैननाइज़ेशन सांस्कृतिक जीवन्तता का विलोम है. वह मूल्यों का एक चौखटा बनाता है.सांस्कृतिक गतिशीलता को ठप्प कर के ठस्सपन की संस्कृति को बढ़ावा देता है. जनरुचि को कीलित करता है. अधिकाँश पढ़े- लिखे भी वही पढ़ते- लिखते हैं, जो पाठ्य -पुस्तकें पढ़ाती हैं.पाठ्य - पुस्तकों की तरह स्मृति -उत्सव भी कैननाइज़ेशन की प्रक्रिया में शामिल होते है.वे 'अज्ञेय' को बचाते हैं और भुवनेश्वर को अज्ञेय बना देते हैं.उन के अपने समय के लिए और आने वाले समयों के लिए भी.
कैननाइज़ेशन सांस्कृतिक प्रक्रिया उतनी नहीं है जितनी राजनीतिक कार्रवाई है. यानी जनरुचि को निर्देशित और निर्धारित करने का उद्यम .राजनीतक सहमति और सहनशीलता के उत्पादन का औजार. राजनीतिक अनुकूलता केवल डंडे के जोर से या प्रचार और प्रोपेगैंडा की बदौलत ही नहीं हासिल की जा सकती. अधिक सहज और टिकाऊ वह तब होती है ,जब वह सांस्कृतिक अनुकूलन के जरिये हासिल की जाती है. सांस्कृतिक मुख्यधारा राजनीतिक मुख्यधारा को मजबूत बनाती है. यही कारण है कि कैनन बनाने में व्यवस्था के मुसाहिबों की सब से ज्यादा दिलचस्पी होती है.

कैनन सांस्कृतिक अनुकूलन का काम मुख्यतः तीन चरणों करता है.एक तो वह रूचि के दायरे को सीमित करता है. वह 'महत्वपूर्ण ' और 'सुन्दर ' की एक संशयमुक्त स्पस्ट अवधारना प्रस्तुत करता है. ' महानता' को परिभाषित करता है. इस परिक्षेत्र या दायरे को पार करना कठिनतर होता जाता है.इस सुगढ़ सीमांकन के जरिये संदिग्द्ध प्रतीत होने वाली रुचियाँ जनक्षेत्र से बाहर धकेल दी जाती हैं. इस पहले चरण को परिसीमन कहा जा सकता है.
दूसरे, और यह अधिक बारीक काम है, वह चुने गए सांस्कृतिक प्रतीकों और व्यक्तित्वों को भी एक विशिष्ट अर्थ प्रदान करता है. एक सांस्कृतिक प्रतीक , चाहे वह कोई वस्तु हो या व्यक्ति, एक से अधिक अर्थो का प्रतिनिधित्व करता हो सकता है.उस में जटिलताये और नवीन व्याख्याओं की संभावानाएं हो सकती हैं. कैनन इन जटिलताओं और सम्भावनाओं को संपादित करता है. वह उन्हें एक सरल और सुविधाजनक अर्थ प्रदान करता है. उदाहरण के लिए भगत सिंह जैसे क्रांतिकारी चिन्तक को देशभक्ति के प्रतीक में घटाया जा सकता है.तिरंगे झंडे के रंगों की व्याख्या , उन के ऐतिहासिक विकासप्रक्रिया को भुला कर, बहुसंख्यक समुदाय की साम्प्रदायिक चिह्नों के सन्दर्भ में की जा सकती है. ' हम होंगे कामयाब' को उदारीकरण का मार्चिंग सॉंग बनाया जा सकता है. होने को यह भी हो सकता है कि त्रिलोचन को साक्षरता का संदेशवाहक और नागार्जुन को हरितक्रान्ति का हिरावल बना दिया जाए. अज्ञेय को व्यक्तिवाद का प्रतीक लगभग बनाया ही जा चुका है.इस प्रक्रिया को विशिष्टीकरण कहा जा सकता है.
तीसरा चरण सब से ज्यादा बारीक है. यह सांस्कृतिक प्रतीकों से समाज के रिश्ते को अपनी जरूरत के हिसाब से डिजाइन करना है. जैसे ही कोई वस्तु या व्यक्ति कैनन में शामिल होता है, समाज से उस का जीवंत रिश्ता ख़त्म हो जाता है. वह समाज की ज़द में नहीं रह जाता. अब आप उस से जब जैसे चाहें बोल- बतिया नहीं सकते, लड़ झगड़ नहीं सकते , परस्पर एक दूसरे को बदल नहीं सकते. समाज की बनायी हुयी चीज , धरती पर पला बढ़ा इंसान , उन से छीन कर स्वर्ग को दे दिया जाता है. वह लगभग किसी स्वर्गीय वस्तु या देव - प्रतिमा में बदल जाता है. यह दिव्यता धरती पर खड़े मनुष्य से उस के संवाद को तो कठिन बनाती ही है, खुद मनुष्य को एक आराधक या दर्शनार्थी में बदल देती है. उत्पादकों का समाज मूकदर्शकों की मंडली में बदल जाता है.इस मूकदर्शक का सांस्कृतिक व्यवहार वैसा ही होता है, जैसा टी वी दर्शकों का होता है. वह आनंदित होता ही , ऊबता है, लेकिन न तो हस्तक्षेप के सकता है, न टी वी ऑफ कर पाता है. इस चरण को प्रतिमाकरण अथवा दैवीकरण कह सकते हैं.

सवाल असल में यह है कि क्या उत्सव के होहल्ले में इन सवालों पर गौर करने का समय बचा है.कोई तर्क कर सकता है , जैसे व्यवस्था अपने कैनन बनाती है , वैसे ही व्यवस्था बदलने वालों को भी अपने कैनन क्यों नहीं बनाने चाहिए . क्या इसी तरीके से स्थापित कैननों को चुनौती देने की जरूरत नहीं है. क्या प्रतिरोध के सांस्कृतिक प्रतीकों की रचना नहीं की जानी चाहिए. इस सवाल के किसी सुलझे हुए जवाब तक पहुँचने के लिए कैननाइज़ेशन की प्रक्रियामात्र के सांस्कृतिक राजनीतिक- अभिप्रायों पर ध्यान देना जरूरी है. जरूरी है स्मरण के शोर में छुपी हुयी विस्मृति की मौन गर्जना को सुनने की कोशिश करना.

शताब्दी - समय में यह जरूरी काम भी हो जाए तो क्या बुरा हो !



Thursday, January 28, 2010

खून की नदी में ताजा गुलाब [गोरख पांडेय की पुण्यतिथि पर ]

गोरख पाण्डेय की अनेक पंक्तियाँ लोक स्मृति का हिस्सा बन चुकीं हैं. वे हमारी चेतना में हमेशा जीवित रहतीं हैं. हम जिन्दगी को जिन रंगों रूपों में पहचानते हैं, वह पहचान ऐसी ही पंक्तियों के उजाले में बनती है.कविता इसी तरह जिन्दगी का हिस्सा बनती है.' आँखें देख कर' एक ऐसी ही कविता है.

" ये आँखें हैं तुम्हारी
तकलीफ का उमड़ता हुआ समुन्दर
इस दुनिया को
जितनी जल्दी हो
बदल देना चाहिए."
कुल कविता यही एक वाक्य है. यहाँ एक भी अतिरिक्त शब्द जोड़ना उस बेचैनी को हल्का कर देना होगा, जो दुनिया बदल देने के लिए जरूरी है .कितनी सुन्दरता होगी उन आँखों में ,जिन में दुनिया भर की ये तकलीफें न होंगी. इस कविता के उजाले में हम उस अदृश्य सुन्दरता को देख पातें हैं , जो अभी तकलीफ के पर्दों में छुपी हुयी है.जीवन की सुन्दरता का जो संकेत इस कविता में है , वही इसे कालजयी बनाता है. इस कविता की विचलित कर देने वाली बेचैनी का यही रहस्य है.
.
'हमारी यादों में छटपटातें हैं
कारीगर के कटे हाथ
सच पर कटी जुबानें चीखतीं हैं हमारी यादों में
हमारी यादों में तड़पता है
दीवारों में चिना हुआ
प्यार!
अत्याचारी के साथ लगातार
होने वाली मुठभेड़ों से
भरे हैं हमारे अनुभव .
यहीं पर एक बूढा माली
हमारे मृत्युग्रस्त सपनों में
फूल और
उम्मीद रख जाता है.' [फूल और उम्मीद]
अछ्छी कवितायें अपने समय का दृश्य लिखतीं हैं. सब से अछ्छी कवितायें वह भी लिखतीं हैं, जो अदृश्य है, लेकिन है.
जीवन यातनामय है . लेकिन यातना जीवन नहीं है. जीवन है यातना के बावजूद उम्मीद. अँधेरे हैं , अत्याचार है, कुरूपताएं हैं , लेकिन यही अंतिम सच्चाई नहीं है.इन से बड़ी सच्चाईयां हैं- उजाला, प्यार और सुन्दरता . सपने और उम्मीदें. इन सच्चाईयों का भरोसा ही संघर्ष के संकल्प को जन्म देता है और ज़िंदा रखता है.गोरख के यहाँ प्यार और जिन्दगी की सुन्दरता ही कविता की बुनियाद है. जिन्दगी इतनी सुन्दर और प्यारी है , इसी लिए उन स्थितियों को समझना और उन को बदलने के लिए लड़ना जरूरी है, जो उसे बदसूरत बनाती हैं.गोरख की कविता जाती तौर पर सौंदर्य और संघर्ष की कविता है.उनकी कविता में हर जगह जहां यातना है, वहीँ उम्मीद भी है .जहां अत्याचार है , वहीँ प्यार भी है, जहां कुरूपताएं हैं , वही सुन्दरता भी है.' खून की नदी' कविता में राजकुमारी और उसे गुलाब के फूल भेंट करने वाले माली को मार दिया जाता है, लेकिन "माली की आत्मा आज भी/राजकुमारी को / ताजा गुलाब के फूल भेंट करती है/जो धारा में तैरते चले जाते हैं ."कविता का अंत यों होता है-
"हमारे गाँव की पीढ़ी-दर-पीढ़ी यादों के
धुंधले किनारों से हो कर
खून की नदी बह निकलती थी
जिस में गुलाब के ताजा फूल तैरते थे."
खून की नदी में ताजा गुलाब. मनुष्यता के इतिहास को शायद ही इस से अधिक सशक्त बिम्ब दिया जा सके.
गोरख एकाकी अवसाद या इकतरफा आह्लाद के कवी नहीं हैं. न विरुद्धों के सामंजस्य के.वे उस संघर्ष के कवी हैं जो जीवन और जीवन-विरोधी स्थितियों के बीच हमेशा जारी रहता है. उनकी कविता अनुभूति की प्रामाणिकता तथा कला की स्वायत्तता की मांग करने वालों का प्रत्याख्यान तो करती ही है,आक्रोश की अराजकता तथा सामंजस्य की समकालीनता से भी सीधी मुठभेड़ करती है .

'स्वर्ग से विदाई गोरख' की अंतिम कविताओं में से है.इस कविता में एक इमारत है जो स्वर्ग जैसी आलिशान और सुविधा संपन्न है. इमारत बन कर खडी हो गयी है और अब मालिकान उन मजदूरों को वहाँ एक क्षण भी रुकने नहीं देना चाहते, जिहोने अपनी मेहनत और कारीगरी से उस का निर्माण किया है.स्वर्ग से कामगारों की विदाई एक ऐसा मोटिफ है जो गोरख की कविताओं में बार बार आता है. आज दुनिया में जो स्वर्ग सरीखी सुख सुविधाएँ मौजूद हैं, वे हजारों बरस की इतिहास यात्रा में मेहनतकश हाथों से निर्मित की गयीं हैं.लेकिन उन्ही मेहनतकशों को उस स्वर्ग से बेदखल कर दिया गया है. यह मनुष्य का उस की सृजनात्मकता से यानी उस की मनुष्यता से अलगाव है.यही मनुष्य की सबसे बड़ी यातना और अपमान है. सामंतो और पूंजीशाहों ने मनुष्य के बनाये स्वर्ग को छीन कर उसे नरक में धकेल दिया है.
ध्यान गए बगैर नहीं रहता की गोरख के यहाँ मनुष्यता का यह अलगाव और अपमान जहां सब से अधिक मूर्त है, वह है स्त्री का जीवन. घर भी एक स्वर्ग है जिसे स्त्री ने अपने खून पसीने से बनाया है. लेकिन इसी घर में वह नरक भी है जहाँ वह एक कैदी की तरह जिन्दगी बसर करती है.घर हो चाहे दुनिया हो , स्वर्गों पर काबिज लोगों ने सच्चे निर्माताओं को नरक में डाल रखा है. लेकिन इस नरक के रहते क्या वे खुद भी सुखी रह सकते हैं?क्या वे खुद भी दण्डित नहीं हैं?गोरख की कविता के पास यह दुर्लभ अंतर्दृष्टि है की सत्ता और पितृसत्ता का का व्याकरण एक है, तर्क एक है और नियति भी एक है
.घर घर में फांसी घर हैं
घर घर में दीवारें हैं
दीवारों से टकरा कर
गिरती है वह
गिरती है आधी दुनिया
सारी
मनुष्यता गिरती है
हम जो ज़िंदा हैं
हम सब अपराधी हैं
हम दण्डित हैं.

इस दंड से मनुष्यता की मुक्ति कैसे होगी?शायद उस मुक्ति संग्राम की अगली कतारों में भी स्त्रियों को ही होना होगा. 'कैथर कला की औरतें' कविता ठीक इसी सम्भावना को सेलिब्रेट करती है.इन जुझारू औरतों के गोल में वह किशोरी भी शामिल है , 'जिसे सात सुरों में पुकारता है प्यार ', जिसने महल अटारी का पत्थर बन जाने की जगह साफ़ कह दिया है की 'मां , मैं जोगी के साथ जाउंगी.'गोरख की कविता में प्यार करना और अन्याय के खिलाफ लड़ना दोनों अपनी मनुष्यता को रिक्लेम करने की एक ही जीवन प्रक्रिया के हिस्से हैं.
सूतल रहलीं सपन एक देखलीं
सपन मनभावन हो सखिया
.............
गोसयाँ के लाठिया मुरइया अस तुरलीं
भगवलीं महाजन हो सखिया
......
बयिरी प्इस्वा के रजवा मेटवलीं
मिलल मोर साजन हो सखिया .

Tuesday, January 26, 2010

संस्कृति के जंगलों में

प्रमोद वर्मा स्मृति सम्मान समारोह में कवि चंद्रकांत देवताले भी मौजूद थे .लौटे तो एक कविता लिखी.इस कविता से एक दो पंक्तियाँ नहीं निकाली जा सकतीं .पूरी कविता इस प्रसंग में चल रही समूची बहस के मर्म को समझने और भीतर तक महसूस करने के लिहाज से इस बीच लिखी गयी टिप्पणियों से कहीं अधिक मूल्यवान है.उसे तीस अगस्त दो हज़ार नौ के रविवारी जनसत्ता में पढ़ा जा सकता है .यहाँ कुछ अंश पेश हैं .
माना हवाई अड्डे पर

कौन जाने किस दुःख को गाड़ कर
उजाड़ में आ रही थीं हवाएं
तेरह जुलाई की सुबह रायपुर के माना हवाई अड्डे पर
झमाझम के बीच सोचता हूँ
अगर मुक्तिबोध होते तो क्या कहते

मैं किसी पर अंगुली नहीं उठा रहा
गड़ा रहा हूँ अपने ही कलेजे में
एक कवि जो कभी नहीं मरता
याद आता है हमेशा बुरे वक़्त में ...........

..........फिर बुदबुदाने लगा आप से आप
मृतकों की सत्यासत्य विवेचना
संभव नहीं है स्तुतियों से
और मुखासीन-पीठासीन-पहुंचे हुए
जीवितों पर संदेह के सिवा
कुछ नहीं किया जा सकता
इस बाजारू समय में.......

.....छूट रही है नीचे धरती धान कटोरे वाली
इन दिनों रक्तरंजित
जंगल और जीवन में बेशकीमती
धडकता-गूंजता..तहस-नहस-हो रहा यहाँ
सोच रहा कौन किस को धोखा दे रहा
सचमुच फर्क करना मुश्किल
एक दूसरे में प्रवेश कर रहे
चेहरे हितैषियों और हत्यारों के.....

विश्व रंजन और खगेन्द्र ठाकुर उस समारोह में आने वालों की सूची में देवता ले के नाम की भी नुमाइश करते हैं.लेकिन कवि के ह्रदय में इस शिरकत को ले कर संशय का जो हा हा कार है ,उस की छाया भी प्रमोद वर्मा के इन हितैषियों के वक्तव्यों में नज़र नहीं आती.इस प्रसंग में श्रीकांत वर्मा का नाम भी लिया गया है .श्रीकांत अपने राजनीतिक गुनाहों के बावजूद बेशक बड़े कवि हैं .'मगध ' की कविताओं में संशय जिस छट पटाती हुयी प्रश्न-विकलता में बदल कर अपने समय से मुठ भेड़ करता है, उस के स्रोत कहाँ हैं?वे जीवन और कला के उन जटिल अंतर्संबंधों में हैं ,जिन की ओर से आँख मूँद लेने की सिफारिश हिंदी के नामवर लेखकों की ओर से की जा रही है.कहा जा रहा है , कौन कहाँ जा रहा है ,किस से क्या पा रहा है , यह सब निरर्थक बहसें हैं.बहस केवल रचना पर होनी चाहिए .

केवल रचना पर! अधिरचना पर नहीं ! रचना पर या महज़ रचना कौशल पर ? बकौल मुक्तिबोध प्रत्येक रचना किसी जीवन समस्या से जन्म लेती है . जीवन समस्या का रिश्ता आधार से होता है और अधिरचना से भी.रायपुर समारोह की सब से बड़ी उपलब्धि यह रही की बहस रचना से अधिरचना तक चली गयी .'सांस्कृतिक सलवा जुडूम' से लेकर सांस्कृतिक संगठन तक बहस के दायरे में आ गए . साहित्य अकादमी के सामसुंग टैगोर पुरस्कारों के प्रसंग में विष्णु खरे ने लिखा की यह भी सांस्कृतिक सलवा जुडूम है . रायपुर में हो चाहे दिल्ली में, इन प्रायोजनों का मकसद इस के सिवा और क्या है की लेखकों को लेखकों से भिडाओ .जिन्हें पीटना है , उन्हें बिरादरी से ही पिटवाओ.जब तक वे सब के सब विपक्ष में रहेंगे , एक साथ एक सुर में सत्ता के खिलाफ चीखते पुकारते रहेंगे. एक सुर एक राग गड़बड़ है अगर वह पंचम सुर में राग दरबारी नहीं है. उस में फांक पैदा करो. टुकड़े फेंको, टुकड़े. फिर देखो क्या मार होती है.विरोध किस तरह सहमतियों की सांस्कृतिक बहुलता और विचारों के संसदीय जनतंत्र में बदल कर हां हां हुआँ हुआँ हो जाता है.

जो टुकड़खोर नहीं हैं , उन को काउंटर करने के लिए एनकाउन्टर स्पेशलिस्ट हैं , न! आयोजन समितियों से लेकर चयन समितियों तक में छाये हुए.

सरकार लेखकों को लड़ाने के लिए निजी एजेंसियों की शरण में जा रही है तो निजी एजेंसियां सरकारों को लड़ा देने के ख्वाब सजा रहीं हैं.आइ आइ पी एम् के अरिंदम सेन ने महाश्वेता देवी , मेधा पाटकर , ममता बनर्जी और खुद के लिए मानवता विका स पुरस्कारों की घोषणा .की है.ये पुरस्कार बंगाल में स्टालिनवाद के उन्मूलन के लिए दिए जा रहें हैं .अरिंदम सेन महाश्वेता को पुरस्कृत करें , यह वैसे ही है जैसे रमण सिंह नामवर सिंह को पुरस्कृत करें साहित्य में विचारधारा की तानाशाही का मूलोच्छेद करने के लिये.

पुरस्कारों के राजनीतिक निहितार्थ हों, यह कोई नयी बात नहीं. नयी बात है संस्कृति और मानवाधिकार के इलाके का नया महत्व.विश्वरंजन का मौलिक योगदान यह है की उन्होंने नक्सल विरोधी अभियान के सन्दर्भ में इस महत्व को समझा है .उन्होंने बार बार कहा है -' नक्सली दस्तावेजों से साफ जाहिर होता है कि उनके एजेंट बहुत सारे प्रजातांत्रिक आंदोलनों और संगठनों (जिन्हें वे आंशिक आंदोलन कहते हैं) में भी घुसपैठ कर चुके हैं जहां की सोंच को वो धीरे-धीरे विकृत करेंगे जनयुद्ध के निर्णायक दौर के समय इस्तेमाल करने के लिए । पर इस लड़ाई में हमें सभी स्तरों पर लड़ना होगा।' [छत्तीसगढ़ अखबार में १५ सितम्बर २००७ को प्रकाशित विश्वरंजन का आलेख .]

'सभी स्तरों पर लड़ना होगा।' सलवा जुडूम एक स्तर है, सांस्कृतिक सलवा जुडूम दूसरा .इस ख़ास परिदृश्य को ध्यान में रखे बगैर संस्कृति मंचों की भूमिका और प्रासंगिकता को लेकर बहस करना बेमानी है.

अभी ''वाक्' में प्रकाशित कुछ लेखों में बहस उठायी गयी है की जमाना बदल चुका है. ये संचार क्रांति और नए मीडिया के दिन हैं. इस जमाने में व्यक्ति का महत्व बढ़ा है, जब की संगठनों की भूमिका खत्म हो चली है.ऐसे में वाम लेखक संगठन भी रीतिकालीन हो चलें हैं. वहाँ घिसीपिटी विचारधाराओं के रीतिकाल चल रहें हैं.निरा पिष्टपेषण चल रहा है, नया कुछ होने हवाने की गुंजाइश नहीं रही.उत्तर-आधुनिक स्थितियां हैं जिन में शब्दों के अर्थों का अनर्थ हो चुका है.लोकतंत्र, धर्म निरपेक्षता, समाजवाद - ऐसे सभी परमपूज्य आधुनिक शब्द अपनी उलटबांसियों में बदल चुके हैं.इतिहास , साहित्य, लेखक , कर्ता....सब का अंत हो चुका है.ऐसे में लेखक संगठनो के लिए कोई काम हो सकता है , तो वह है, हिंदी के गरीब लेखकों के कल्याण के लिए , उन्हें प्रकाशकों के शोषण से बचाने के लिए , कुछ जन -जागरण करना , चन्दा शंदा करना .लेकिन लेखक संगठन तो यह भी नहीं करते. वे पार्टी के तानाशाहों ,नौकरशाहों और उन के चापलूसों के लिए आत्मोत्थान के साधन मात्र बन कर रह गएँ हैं.वे प्रतिभाओं के उत्पीडन और नकलियों की नक्शेबाजी के अड्डों में बदल चुके हैं.गर अब भी वे अपना भला चाहते हों , तो उन्हें सब से पहले उन राजनीतिक पार्टियों के शिकंजे से मुक्त हो जाना चाहिए , जिन से वे नाभिनालबद्ध हैं.

ये बातें लेखक ने केवल सैद्धांतिक आधार पर नहीं कहीं हैं. एक ख़ास लेखकसंघ में काम करने के अपने अनुभवों के आधार पर भी कहीं हैं,सब जानते हैं की एक अन्य लेखकसंघ के बारे में भी मिलती जुलती बातें उस के अनेक सदस्यों की ओर से कही गयीं हैं . कई लेखकों ने इस्तीफे भी दिए हैं. वाम संस्कृति का जो तीसरा मंच है, उस पर भी एक पुराने सदस्य ने ऐसे ही आरोप लगाये थे , जब उस से रायपुर समारोह में शामिल न होने के मंच के फैसले के खिलाफ जाने के लिए स्पस्टीकरण माँगा गया था .

सांस्कृतिक संगठनों में पार्टियों की तानाशाही का एक नमूना देखें . भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के मनीष कुंजम छतीसगढ़ में सलवा जुडूम के खिलाफ आवाज उठाते रहें हैं. वे माओवादी हिंसा की भी आलोचना करते हैं और स्थानीय संसाधनों की कार्पोरेट हड़प लीला की भी.उन की जान पर दोतरफा ख़तरा है. विश्वरंजन के सिपाही उन्हें नक्सली करार दे कर उन का उत्पीडन करते हैं.सरकार ने उन के एकमात्र सुरक्षा गार्ड को भी हटा दिया है. लेकिन प्रगतिशील लेखक संघ , जिसे भाकपा से नाभिनालबद्ध बताया जाता है , विश्वरंजन के समारोहों में शामिल हो कर गौरवान्वित महसूस करता है. क्या आज वामपंथी पार्टियां खुद इस हालत में हैं की वे सांस्कृतिक संगठनों पर पर स्तालिनवादी किस्म का नियंत्रण कायम कर सकें?आज असली संकट पार्टियों की तानाशाही नहीं,बल्कि यह है की पार्टियाँ और जन संगठन एक दुसरे से इस कदर स्वायत्त हो गएँ हैं की बाएं हाथ को पता ही नहीं की दाहिना हाथ क्या कर रहा है.अचरज यह है की जिन्हें सारी दुनिया की उलटबांसियां दिखाई दे रहीं हैं , उन के लेखे केवल भारत की वामपंथी पार्टियाँ अपने शुद्ध शाश्वत शाश्त्रीय रूप में बची हुयी हैं!

अब सूचना- संचार- मीडिया क्रांति पर दो एक बातें. समझदारों का कहना है की इस क्रांति ने जनतांत्रिक अवकाश का अभूतपूर्व विस्तार किया है.जेसिका, आरुशी , रुचिका के मामले ज़िंदा हैं तो इसी क्रांति के बदौलत. इंटरनेट तो शायद आग के बाद मानवजाति का दूसरा सब से महत्वपूर्ण आविष्कार है .यह तो मैं अपने निजी अनुभव के आधार पर भी कह सकता हूँ की इंटरनेट ने खुद मेरी जिन्दगी को जितना बदल दिया है , उतना न न्यूटन के गुरुत्वाकर्षण ने बदला था , न आइनस्टीन के सापेक्षतावाद ने. जरूरी जानकारियों के लिए आज न मुझे सरकार का मुंह देखना है न निजी चैनलों का. आप सब से सुख दुःख की दो बातें करने के लिए भी मुझे न किसी सेठ का मुंह देखना है , न किसी जेठ का.

तो जेसिका , आरुशी , रुचिका को न्याय मिल जाएगा न? और निठारी के नरपिशाचों को भी?मोदी , आडवाणी , वाजपायियों को? मनमोहन , सोनियों , राहुलों को ? लालुओं , मुलायमों . ममताओं , बुद्धदेवों को ?बुशों , ब्लेअरों , ओबामाओं को? ? कम से कम मुझे तो ऐसी उम्मीद नहीं. तकनीक अन्तःतः ताकतवरों की ही सेवा करती है. ज्ञान और विचारधाराएँ भी. लोकतंत्र सब से अधिक साम्राज्यवाद के ही काम आया न ?यहाँ तक की मार्क्सवाद भी? और उत्तराधुनिकतावाद?

इंटरनेट इस समय पूँजी का सब से बड़ा अखाड़ा है. संस्कृति सहमतियों के उत्पादन का औजार पहले भी थी . आज तकनीक ने उसे एक ऐसी ताकत मुहैय्या कर दी है जो पहले कभी मुमकिन न था.चौबीस घंटों के न्यूज चैनल किस संस्कृति का निर्माण कर रहे हैं?व्यक्ति ताकतवर हुआ है या इतिहास के इसी दौर में सब से अधिक अकेला? सांस्कृतिक सलवा जुडूम के लिए जिस जंगल की जरूरत है, उसे पूँजी , तकनीक और सूचना विस्फोट के इस नए जमाने ने ही जन्म दिया है.

हाँ , प्रतिरोध की ताकतें भी इस तकनीक क्रांति के लाभ ले सकतीं हैं . जैसे की वे पहले भी ले सकतीं थीं. लेकिन ऐसा वे तभी कर सकतीं हैं , जब वे संगठित हों. जैसा की जन संस्कृति मंच के महासचिव प्रणय कृष्ण ने मंच के पिछले सम्मलेन में चेताया था, पूँजी की ताकत का मुकाबला केवल संगठन की ताकत से किया जा सकता है!

इस लिए आज संगठनों की तमाम कमजोरियों का इलाज यह नहीं है की उन्हें दफना दिया जाय .जरूरत यह है की उन पर भरपूर बहस की जाय , बीमारियों का सही निदान किया जाय, ताकि संगठन ठीक तरीके से वह काम कर सकें जो केवल वही कर सकते हैं. आज जब संस्कृति की लड़ाई अपने सब से अधिक खतरनाक और नाजुक दौर में है , तब सांस्कृतिक संगठनों को ही प्रतिरोध के अगुआ दस्तों के रूप में काम करना है. क्या हम भूल गए की पिछले दो दशकों में इस देश में प्रतिक्रया का जो पुनरुत्थान हुआ है उस का नेतृत्व एक ऐसे संघ ने किया है जो अपने को एक सांस्कृतिक संगठन कहता है?

आज हिंदी के वामपंथी लेखकों के बीच दो तरह के आत्मघाती विचार चलन में है. एक तरफ वे हैं , जो हर बहस को बेवफाई करार दे रहे हैं. दूसरी तरफ वे हैं जो बेवफाई को ही आज की विचारधारा बता रहें हैं.अब आप ही यह तय करें की आप किस ओर हैं!

Monday, January 18, 2010

कहते हैं तब शहंशाह सो रहे थे

'कहते हैं तब शहंशाह सो रहे थे ' उमाशंकर चौधरी का कविता संग्रह है.भारतीय ज्ञानपीठ से इसका पहला संस्करण सन २००९ में प्रकाशित हुआ है.इस संग्रह में एक कविता है- इस विकसित दौर में . .इस विकसित दौर में चारो ओर विकास की चर्चा है , विकास की दौड़ है .लेकिन खुद विकास शब्द के मायने बदल गए हैं.जैसे एक विकास यह है की ' अब हत्यारों से डरने का वक़्त चला गया है'.कारण यह है की ' ह्त्या , हथियार और हत्यारा अब अंडरवर्ल्ड से ज्यादा बाज़ार के शब्द हैं'. अंडरवर्ल्ड बाज़ार में और बाज़ार अंडरवर्ल्ड में तब्दील हो गया है.बाज़ार इतना ताकतवर हो गया है की उस ने शब्दों से अर्थ छीन लिए हैं और लोगों से उन की आत्माएं .' भीड़ अब देश की ताकत नहीं' में कवी कहता है - 'अब यह भीड़ एक ऐसी भीड़ हो गयी है , जो / धीरे धीरे तब्दील होती जा रही है / उपभोक्ताओं की एक श्रेणी में. और जिसे / तैयार किया है बाज़ार ने / अपनी प्रयोगशाला में अपने मुनाफे के लिए' .'यह एक ठंडी भीड़ है / जिन की आत्माएं मर चुकीं हैं, और जो / निकले हुए हैं सड़क पर दो वक़्त की रोटी और/ एक अदद अवसर के लिए '. अब यह भीड़ न किसी फ़रियाद के लिए जुट रही है, न सत्य के किसी संघर्ष के लिए.'अब यह जुटती है /अन्याय को न्याय साबित करने के लिए/और किसी ताकतवर को अपना नेता चुन ने के लिए.'
बाज़ार की दहशत इतनी ज्यादा है की कवी की निराशा का कोई अंत नहीं है.अगर यह भीड़ अचानक क्रांतिकारी तेवर अपना ले तो क्या होगा ? 'सच कहूँ-/ उन्हें गोली दाग दी जाएगी /और बचे हुए लोगों से छीन लिए जायेंगे /उन के सूक्ष्म अवसर . ' जाहिर है ,ऐसे में मृत्यु निश्चित है.एक अन्य कविता में कवी को यकीन है की 'आप के हर पल सतर्क रहने से भी कुछ नहीं हो सकता /आप की मृत्यु निश्चित है /चूंकि आप जीवित हैं./इस लिए आप की मृत्यु निश्चित है./आप की हत्या ऊपर से ही कर दी जायेगी/और कर क्या दी जाएगी /रोज की जा रही है /और आप को पता भी नहीं चल पाता है'. पता भी कैसे चले , आप की आत्मा तो पहले ही मर चुकी है .लेकिन कवी को सब कुछ पता है .कैसे पता है ?जब सब की आत्माएं मर चुकीं हैं तो उस की ही जीवित कैसे बची हुई है ?
शायद इस लिए की वह कवी है .शायद इसी लिए वह कवी है .वह मृत आत्माओं की भीड़ में शामिल नहीं है .वह इस भीड़ के बारे में कवितायेँ लिखता है .वह इसी भीड़ के लिए कवितायेँ लिखता है .लेकिन वह इस भीड़ का हिस्सा नहीं है.वह इस से अलग है, ऊपर है. इसी लिए तो वह भीड़ लिखता है .जनता नहीं, अवाम नहीं. 'भीड़ अब देश की ताकत नहीं
'
'कुछ कम मनुष्य होता तो ..'कविता में ' मैं' अपनी प्रेमिका से संवाद करता है .प्रेमिका को उस के प्यार पर संदेह है .वह उसे लाख समझाता है की उस के बिना वह कितना अधूरा महसूस करता है .उसे उस की हर शर्त मंजूर है.उसे अपनी सच्चाई पर यकीन है.वह यह भी जानता है की प्रेमिका भी इस सच्चाई को जानती है . मामला बिगड़ता तब है , जब वह अपनी सच्चाई की रु में यह सच भी कबूल करने से नहीं चूकता 'की मैं तुम्हे जितना प्यार करता हूँ/ तुम्हारे गदराये हुए बदन को भी उतना ही प्यार करता हूँ '.प्रेमिका इस पर तिलमिला उठती है.'मैं' कहता है- 'असली सच शायद मैं जानता हूँ/ यदि मैं कुछ कम मनुष्य होता तो/कुछ और दिनों तक, उस के साथ रह पाता.'
असली सच क्या है ?यह मनुष्य जो अपनी प्रेमिका को और उस के 'गदराये बदन ' को एक ही तरह लेकिन अलग अलग प्यार करता है , वह कितना मनुष्य है और अपनी प्रेमिका को कितना मनुष्य समझता है ?पूरी कविता में 'मैं' अपने प्यार का बखान तो करता है , लेकिन प्रेमिका के व्यक्तित्व के बारे में एक शब्द नहीं बताता. हम नहीं जान पाते की उस की भावनाएं क्या है, बुद्धि-विचार क्या है, आदतें कैसीं हैं , पसंद -नापसंद क्या है.सिवा इस के की उस का बदन गदराया हुआ है .साफ़ है की उस के प्यार का आधार गदराया बदन ही है.इसी को वह अपनी अतिरिक्त मनुष्यता समझता है. उसे यकीन है की यदि वह कुछ कम मनुष्य होता तो प्रेमिका उस के साथ रह लेती. यानी प्रेमिका तो है ही कमतर मनुष्य. इस कविता में कवी किस के साथ है?'मैं' के या प्रेमिका के?कवी ने इस कविता में नैरेटर की कुर्सी 'मैं'को ही बख्शी है. वह कम से कम प्रेमिका को भी कुछ अपनी बात कहने का अवसर तो दे ही सकता था.
परेशानी असल में यह है की बाज़ार ने प्यार को भी खराब कर दिया है.'जरूरी है प्यार का बचना'; कविता में कवी पुराने और नए जमाने के प्यार पर विचार करता है. 'अब उस स्थिति की मात्र कल्पना की जा सकती हैकि/ किस स्तर का प्रेम रहा होगाप्रेम करने वाले /उन जोड़ों के बीच जो सिर्फ एक-दुसरे के विश्वास को साथ लेकर /भाग जाते थे इ स समाज से बहुत दूर/ एक अलग दुनिया बसाने के लिए.' अब क्या हो गया है की
लड़के लड़कियों को हिसाब किताब ज्यादा आ गया है.वे 'अपने प्रेम और प्रेम विवाह को /अपने भविष्य की दृष्टि से उठाया गयाकदम साबित करना चाहते हैं.' 'अब प्रेम की ऊंचाई एक-दुसरे के लिए/जीना और मरना नहीं/एक दुसरे केसाथ तरीके से रह जाना भर है.'प्यार का यह नया चलन कवी के मुताबिक़ 'मनुष्य के बर्बर होते जाने' का संकेत है.यानी प्यार में भावुकता और भगोड़ा पन ही मनुष्यता है , जब की जिंदगी की समझदारी बर्बरता है!इस में संदेह नहीं की कवी मनुष्यता का बड़ा प्रेमी है , लेकिन मनुष्यता की उस की समझ खासी चक्करदार जान पड़ती है .
लड़कियां बदल गयीं हैं . 'लड़कियां अब प्यार नहीं चाहतीं /वह टिकने के लिए एक कंधा भी नहीं चाहतीं /वह चाहतीं हैं अब एक ऐसा जीवन साथी जिस के साथ /वह कदम से कदम मिला कर दौड़ सकें .'लकिन लड़कियां यह जो चाहतीं हैं ,उसे प्यार क्यों नहीं कहा जा सकता?

'शहंशाह की नींद' वह कविता है , जिस से संग्रह का शीर्षक लिया गया है.कविता के पहले कवि ने स्वयं उस का सामयिक सदर्भ स्पष्ट कर दिया है.जब सद्दाम हुसैन को फांसी दी जा रही तब बुश सो रहे थे.लकिन बुश अकेले नहीं सो रहे थे. उन के साथ बाकी दुनिया भी सो रही थी. यानी अगर दुनिया सो नहीं रही होती तो इतिहास का यह सब से आपराधिक युद्ध घटित ही न हो सकता था.इस लिए 'अब यह जितना /सभ्यता और संस्कृतियों के टकराव का समय नहीं है /उस से अधिक है यह नींदों के टकराव का.' नींदों के टकराव का या सह-अस्तित्व का?नींदों के टकराव का मुहावरा चौंकाता तो है , लेकिन एक जटिल स्थिति का सरलीकरण भी करता है. दुनिया पर अमरीकी शहन्शाहियत का कब्ज़ा एक सच है तो यह भी सच है की प्रतिरोध भी तब से अब तक अनेक रूपों में जारी है.लेकिन जिस बदले हुए जमाने की खबर देने कवि निकला है, उस जमाने में उसे चंहु ओर अन्धेरा ही अन्धेरा दीख पड़ता है , उस अँधेरे में चकमक की चिंगारियां कही नज़र ही नहीं आतीं.

इस विकसित दौर में बाज़ार के खेल सचमुच निराले हैं .वह शब्दों से अर्थ छीन लेता है और लोगों से उन की आत्माएं.क्या वह कविता से यह अंतर्दृष्टि भी छीन लेता है,की अंततः सब से बड़ा सत्य मनुष्य ही है, न इश्वर. न शहंशाह , न बाज़ार.?.

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