Monday, January 18, 2010

कहते हैं तब शहंशाह सो रहे थे

'कहते हैं तब शहंशाह सो रहे थे ' उमाशंकर चौधरी का कविता संग्रह है.भारतीय ज्ञानपीठ से इसका पहला संस्करण सन २००९ में प्रकाशित हुआ है.इस संग्रह में एक कविता है- इस विकसित दौर में . .इस विकसित दौर में चारो ओर विकास की चर्चा है , विकास की दौड़ है .लेकिन खुद विकास शब्द के मायने बदल गए हैं.जैसे एक विकास यह है की ' अब हत्यारों से डरने का वक़्त चला गया है'.कारण यह है की ' ह्त्या , हथियार और हत्यारा अब अंडरवर्ल्ड से ज्यादा बाज़ार के शब्द हैं'. अंडरवर्ल्ड बाज़ार में और बाज़ार अंडरवर्ल्ड में तब्दील हो गया है.बाज़ार इतना ताकतवर हो गया है की उस ने शब्दों से अर्थ छीन लिए हैं और लोगों से उन की आत्माएं .' भीड़ अब देश की ताकत नहीं' में कवी कहता है - 'अब यह भीड़ एक ऐसी भीड़ हो गयी है , जो / धीरे धीरे तब्दील होती जा रही है / उपभोक्ताओं की एक श्रेणी में. और जिसे / तैयार किया है बाज़ार ने / अपनी प्रयोगशाला में अपने मुनाफे के लिए' .'यह एक ठंडी भीड़ है / जिन की आत्माएं मर चुकीं हैं, और जो / निकले हुए हैं सड़क पर दो वक़्त की रोटी और/ एक अदद अवसर के लिए '. अब यह भीड़ न किसी फ़रियाद के लिए जुट रही है, न सत्य के किसी संघर्ष के लिए.'अब यह जुटती है /अन्याय को न्याय साबित करने के लिए/और किसी ताकतवर को अपना नेता चुन ने के लिए.'
बाज़ार की दहशत इतनी ज्यादा है की कवी की निराशा का कोई अंत नहीं है.अगर यह भीड़ अचानक क्रांतिकारी तेवर अपना ले तो क्या होगा ? 'सच कहूँ-/ उन्हें गोली दाग दी जाएगी /और बचे हुए लोगों से छीन लिए जायेंगे /उन के सूक्ष्म अवसर . ' जाहिर है ,ऐसे में मृत्यु निश्चित है.एक अन्य कविता में कवी को यकीन है की 'आप के हर पल सतर्क रहने से भी कुछ नहीं हो सकता /आप की मृत्यु निश्चित है /चूंकि आप जीवित हैं./इस लिए आप की मृत्यु निश्चित है./आप की हत्या ऊपर से ही कर दी जायेगी/और कर क्या दी जाएगी /रोज की जा रही है /और आप को पता भी नहीं चल पाता है'. पता भी कैसे चले , आप की आत्मा तो पहले ही मर चुकी है .लेकिन कवी को सब कुछ पता है .कैसे पता है ?जब सब की आत्माएं मर चुकीं हैं तो उस की ही जीवित कैसे बची हुई है ?
शायद इस लिए की वह कवी है .शायद इसी लिए वह कवी है .वह मृत आत्माओं की भीड़ में शामिल नहीं है .वह इस भीड़ के बारे में कवितायेँ लिखता है .वह इसी भीड़ के लिए कवितायेँ लिखता है .लेकिन वह इस भीड़ का हिस्सा नहीं है.वह इस से अलग है, ऊपर है. इसी लिए तो वह भीड़ लिखता है .जनता नहीं, अवाम नहीं. 'भीड़ अब देश की ताकत नहीं
'
'कुछ कम मनुष्य होता तो ..'कविता में ' मैं' अपनी प्रेमिका से संवाद करता है .प्रेमिका को उस के प्यार पर संदेह है .वह उसे लाख समझाता है की उस के बिना वह कितना अधूरा महसूस करता है .उसे उस की हर शर्त मंजूर है.उसे अपनी सच्चाई पर यकीन है.वह यह भी जानता है की प्रेमिका भी इस सच्चाई को जानती है . मामला बिगड़ता तब है , जब वह अपनी सच्चाई की रु में यह सच भी कबूल करने से नहीं चूकता 'की मैं तुम्हे जितना प्यार करता हूँ/ तुम्हारे गदराये हुए बदन को भी उतना ही प्यार करता हूँ '.प्रेमिका इस पर तिलमिला उठती है.'मैं' कहता है- 'असली सच शायद मैं जानता हूँ/ यदि मैं कुछ कम मनुष्य होता तो/कुछ और दिनों तक, उस के साथ रह पाता.'
असली सच क्या है ?यह मनुष्य जो अपनी प्रेमिका को और उस के 'गदराये बदन ' को एक ही तरह लेकिन अलग अलग प्यार करता है , वह कितना मनुष्य है और अपनी प्रेमिका को कितना मनुष्य समझता है ?पूरी कविता में 'मैं' अपने प्यार का बखान तो करता है , लेकिन प्रेमिका के व्यक्तित्व के बारे में एक शब्द नहीं बताता. हम नहीं जान पाते की उस की भावनाएं क्या है, बुद्धि-विचार क्या है, आदतें कैसीं हैं , पसंद -नापसंद क्या है.सिवा इस के की उस का बदन गदराया हुआ है .साफ़ है की उस के प्यार का आधार गदराया बदन ही है.इसी को वह अपनी अतिरिक्त मनुष्यता समझता है. उसे यकीन है की यदि वह कुछ कम मनुष्य होता तो प्रेमिका उस के साथ रह लेती. यानी प्रेमिका तो है ही कमतर मनुष्य. इस कविता में कवी किस के साथ है?'मैं' के या प्रेमिका के?कवी ने इस कविता में नैरेटर की कुर्सी 'मैं'को ही बख्शी है. वह कम से कम प्रेमिका को भी कुछ अपनी बात कहने का अवसर तो दे ही सकता था.
परेशानी असल में यह है की बाज़ार ने प्यार को भी खराब कर दिया है.'जरूरी है प्यार का बचना'; कविता में कवी पुराने और नए जमाने के प्यार पर विचार करता है. 'अब उस स्थिति की मात्र कल्पना की जा सकती हैकि/ किस स्तर का प्रेम रहा होगाप्रेम करने वाले /उन जोड़ों के बीच जो सिर्फ एक-दुसरे के विश्वास को साथ लेकर /भाग जाते थे इ स समाज से बहुत दूर/ एक अलग दुनिया बसाने के लिए.' अब क्या हो गया है की
लड़के लड़कियों को हिसाब किताब ज्यादा आ गया है.वे 'अपने प्रेम और प्रेम विवाह को /अपने भविष्य की दृष्टि से उठाया गयाकदम साबित करना चाहते हैं.' 'अब प्रेम की ऊंचाई एक-दुसरे के लिए/जीना और मरना नहीं/एक दुसरे केसाथ तरीके से रह जाना भर है.'प्यार का यह नया चलन कवी के मुताबिक़ 'मनुष्य के बर्बर होते जाने' का संकेत है.यानी प्यार में भावुकता और भगोड़ा पन ही मनुष्यता है , जब की जिंदगी की समझदारी बर्बरता है!इस में संदेह नहीं की कवी मनुष्यता का बड़ा प्रेमी है , लेकिन मनुष्यता की उस की समझ खासी चक्करदार जान पड़ती है .
लड़कियां बदल गयीं हैं . 'लड़कियां अब प्यार नहीं चाहतीं /वह टिकने के लिए एक कंधा भी नहीं चाहतीं /वह चाहतीं हैं अब एक ऐसा जीवन साथी जिस के साथ /वह कदम से कदम मिला कर दौड़ सकें .'लकिन लड़कियां यह जो चाहतीं हैं ,उसे प्यार क्यों नहीं कहा जा सकता?

'शहंशाह की नींद' वह कविता है , जिस से संग्रह का शीर्षक लिया गया है.कविता के पहले कवि ने स्वयं उस का सामयिक सदर्भ स्पष्ट कर दिया है.जब सद्दाम हुसैन को फांसी दी जा रही तब बुश सो रहे थे.लकिन बुश अकेले नहीं सो रहे थे. उन के साथ बाकी दुनिया भी सो रही थी. यानी अगर दुनिया सो नहीं रही होती तो इतिहास का यह सब से आपराधिक युद्ध घटित ही न हो सकता था.इस लिए 'अब यह जितना /सभ्यता और संस्कृतियों के टकराव का समय नहीं है /उस से अधिक है यह नींदों के टकराव का.' नींदों के टकराव का या सह-अस्तित्व का?नींदों के टकराव का मुहावरा चौंकाता तो है , लेकिन एक जटिल स्थिति का सरलीकरण भी करता है. दुनिया पर अमरीकी शहन्शाहियत का कब्ज़ा एक सच है तो यह भी सच है की प्रतिरोध भी तब से अब तक अनेक रूपों में जारी है.लेकिन जिस बदले हुए जमाने की खबर देने कवि निकला है, उस जमाने में उसे चंहु ओर अन्धेरा ही अन्धेरा दीख पड़ता है , उस अँधेरे में चकमक की चिंगारियां कही नज़र ही नहीं आतीं.

इस विकसित दौर में बाज़ार के खेल सचमुच निराले हैं .वह शब्दों से अर्थ छीन लेता है और लोगों से उन की आत्माएं.क्या वह कविता से यह अंतर्दृष्टि भी छीन लेता है,की अंततः सब से बड़ा सत्य मनुष्य ही है, न इश्वर. न शहंशाह , न बाज़ार.?.

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14 comments:

मृत्युंजय said...

ऐसा क्यूँ है या सिर्फ मुझे ही ऐसा लगता है कि
सामंतवाद विरोधी समझ नयी कहानियों और कविताओं में कम होती जा रही है?
जहाँ तक भू मंडलीकरण क़ी बात है उसका बहुविध विरोध आजकल साहित्य में हो रहा है.
पर यह कौन सा रंग लिए है ?
बाज़ार के विरोध के पीछे क़ी विचार धारा क्या है?
बेरोजगार नौजवान क़ी छटपटाहट के अलावा साम्राज्यवाद विरोध के पीछे क्या लोक क़ी ताकत है?
या अपनी परंपरा के पुनर्मूल्यांकन का विवेक ?

में यह नहीं कहना चाहता हूँ कि यह सारा लेखन ज़बरदस्त नहीं है,
पर इसके आधार क़ी तलाश करने का मन करता है.

मृत्युंजय

शिरीष कुमार मौर्य said...

आशुतोष जी ब्लॉग शुरू करने की बधाई.
हिंदी आलोचना का यहाँ से ज़रूर कुछ भला होगा. अनुनाद की ब्लॉग सूची में जोड़ दिया है.

धीरेश said...

वह चाहतीं हैं अब एक ऐसा जीवन साथी जिस के साथ /वह कदम से कदम मिला कर दौड़ सकें .'लकिन लड़कियां यह जो चाहतीं हैं ,उसे प्यार क्यों नहीं कहा जा सकता?
बेशक प्रेम का फंदा ख़ासा मुश्किल हुआ है और एक तौल-मौल बढ़ गया है लेकिन कदम से कदम मिलाकर दौड़ने की लडकी की इच्छा में क्या कमी है?
आपके ब्लॉग का नाम बहुत अच्छा है और उसके साथ पंच लाइन भी. ब्लॉग में लिंक देना मुझे आता नहीं, दिल्ली लौटकर किसी से कराऊंगा. बहरहाल दोस्तों को लिंक मेल कर रहा हूँ. आपकी किताब का कुंवरनारायण वाला चैप्टर बेहद सहस भरा है. वो भी टाईप करना है लौटकर.

अविनाश वाचस्पति said...

आशुतोष जी आप जो कार्य कर रहे हैं उस पर पुनर्विचार करने की जरूरत नहीं है परन्‍तु शब्‍द पुष्टिकरण को निष्क्रिय अवश्‍य कीजिएगा।

shama said...

Blog jagat me aapka swagat hai!

आशुतोष कुमार said...

शुक्रिया दोस्तों ...और उस से भी ज्यादा मुबारकबाद . हमें बिगाड़ने में आप सब कामयाब रहे

माणिक said...

bachha lkhte hai. bhaiya ji likhte rahen ham padte rahe bas.
manik
http://www.apnimaati.blogspot.com/

अजय कुमार said...

हिंदी ब्लाग लेखन के लिये स्वागत और बधाई । अन्य ब्लागों को भी पढ़ें और अपनी बहुमूल्य टिप्पणियां देने का कष्ट करें

संगीता पुरी said...

इस नए ब्‍लॉग के साथ आपका हिन्‍दी ब्‍लॉग जगत में स्‍वागत है .. आपसे बहुत उम्‍मीद रहेगी हमें .. नियमित लेखन के लिए शुभकामनाएं !!

vinay said...

स्वागत है बलोग जगत में ।

premshankar said...

hum bhee dekhenge...

javed alam said...

sir blogjagat se judne par apko dhher sari badhaiyan.ye sach hai ki aaj hamari samvedanaye so chuki hain.nahi to kya shahanshah sukun ki need so pate?? aaj mujhe kabir ki un panktiyo ki prasangikta samajh me aa rahi hai jisme kabir samaj ko khubh khane aur sone se mana karte hain.aur swayem he jaagte aur rote rahte hain.(jaage aur roye).maine is blog par GORAKH PANDE ki pudyaesmrty per likha apka lekh pada. Gorakh Pande bhi apni kavita-sangrah main wahi baat kahte hain "Sone wale jaagte raho".

shahbaz said...

ब्लॉग खोलने के लिए बधाई.... बधाई इसलिए नहीं के नेट पर एक और ब्लॉग का इज़ाफ़ा होगया.बल्कि आलोचना की खो रही ज़मीन और उसकी तहज़ीब को फिरसे तलाश करने के लिए तहे दिल से बधाई. चौधरी (उमा शंकर) साहब का बड़ा नाम सुना था, पढ़ा तो मायूसी हाथ लगी. उसपे आपकी पारदर्शी भाषा में धारदार आलोचना ने पूरी समझ साफ़ कर दी, मेरी भी और कवि की भी. 'अब यह भीड़ एक ऐसी भीड़ हो गयी है , जो / धीरे धीरे तब्दील होती जा रही है / उपभोक्ताओं की एक श्रेणी में. और जिसे / तैयार किया है बाज़ार ने / अपनी प्रयोगशाला में अपने मुनाफे के लिए' .'यह एक ठंडी भीड़ है / जिन की आत्माएं मर चुकीं हैं, और जो / निकले हुए हैं सड़क पर दो वक़्त की रोटी और/ एक अदद अवसर के लिए '. जनता और भीड़ के बीच एक मोटा फ़र्क है जो कवि को शायद नहीं मालूम.जनता एक होती है.उसका वर्गीकरण नहीं होता.भीड़ के जत्थे होते है.उसका वर्गीकरण होता है.साथ ही जनता सब समझती है.मगर वो चिल्ला कर जतलाती नहीं के भई हम सब समझते है.हम बहुत ऊँचे दर्जे के है.हमारी समझ साफ है.ये काम भीड़ का है.चाहे वो भीड़ कवियों और साहित्यकारों की ही क्यूँ न हो. चौधरी साहब भी शायद इसी भीड़ में शामिल है जो अपने को ख़ास समझ कर जनता कि समझ को गरियाते हैं.... एक शेर है शहरयार साहब का.......'' तू बहुत मुझसे मुख्तलिफ़ निकला/ मैं मगर आम लोगों जैसा हूँ.'' ख़ैर.... आज इस तरह कि आलोचना कि सख्त ज़रूरत है जिसका एक साहित्यिक तर्क तथा संस्कार हो.अपने गोरख पाण्डेय कि कविता देकर बहुत शानदार कम किया है.इससे पाठक को और कवियों को भी कविता तथा जनता कि शक्ति का अहसास होगा. शाहबाज़

pankaj said...

it is a very interesting, crystal-clear and eye-opening review comprising of excellent wit, sharpness and valuable ideas. i am really impressed by it. you need to thoroughly examine the course of hindi poetry since naxalbaadi upto 2010. then, i think, you will certainly be able to enrich the criticism of hindi poetry in an unique and marvellous manner in the 'CRITICALLY SILENT' period after the publication of 'kavita ke naye pratimaan'.
-----pankaj chaturvedi, kanpur