Tuesday, January 26, 2010

संस्कृति के जंगलों में

प्रमोद वर्मा स्मृति सम्मान समारोह में कवि चंद्रकांत देवताले भी मौजूद थे .लौटे तो एक कविता लिखी.इस कविता से एक दो पंक्तियाँ नहीं निकाली जा सकतीं .पूरी कविता इस प्रसंग में चल रही समूची बहस के मर्म को समझने और भीतर तक महसूस करने के लिहाज से इस बीच लिखी गयी टिप्पणियों से कहीं अधिक मूल्यवान है.उसे तीस अगस्त दो हज़ार नौ के रविवारी जनसत्ता में पढ़ा जा सकता है .यहाँ कुछ अंश पेश हैं .
माना हवाई अड्डे पर

कौन जाने किस दुःख को गाड़ कर
उजाड़ में आ रही थीं हवाएं
तेरह जुलाई की सुबह रायपुर के माना हवाई अड्डे पर
झमाझम के बीच सोचता हूँ
अगर मुक्तिबोध होते तो क्या कहते

मैं किसी पर अंगुली नहीं उठा रहा
गड़ा रहा हूँ अपने ही कलेजे में
एक कवि जो कभी नहीं मरता
याद आता है हमेशा बुरे वक़्त में ...........

..........फिर बुदबुदाने लगा आप से आप
मृतकों की सत्यासत्य विवेचना
संभव नहीं है स्तुतियों से
और मुखासीन-पीठासीन-पहुंचे हुए
जीवितों पर संदेह के सिवा
कुछ नहीं किया जा सकता
इस बाजारू समय में.......

.....छूट रही है नीचे धरती धान कटोरे वाली
इन दिनों रक्तरंजित
जंगल और जीवन में बेशकीमती
धडकता-गूंजता..तहस-नहस-हो रहा यहाँ
सोच रहा कौन किस को धोखा दे रहा
सचमुच फर्क करना मुश्किल
एक दूसरे में प्रवेश कर रहे
चेहरे हितैषियों और हत्यारों के.....

विश्व रंजन और खगेन्द्र ठाकुर उस समारोह में आने वालों की सूची में देवता ले के नाम की भी नुमाइश करते हैं.लेकिन कवि के ह्रदय में इस शिरकत को ले कर संशय का जो हा हा कार है ,उस की छाया भी प्रमोद वर्मा के इन हितैषियों के वक्तव्यों में नज़र नहीं आती.इस प्रसंग में श्रीकांत वर्मा का नाम भी लिया गया है .श्रीकांत अपने राजनीतिक गुनाहों के बावजूद बेशक बड़े कवि हैं .'मगध ' की कविताओं में संशय जिस छट पटाती हुयी प्रश्न-विकलता में बदल कर अपने समय से मुठ भेड़ करता है, उस के स्रोत कहाँ हैं?वे जीवन और कला के उन जटिल अंतर्संबंधों में हैं ,जिन की ओर से आँख मूँद लेने की सिफारिश हिंदी के नामवर लेखकों की ओर से की जा रही है.कहा जा रहा है , कौन कहाँ जा रहा है ,किस से क्या पा रहा है , यह सब निरर्थक बहसें हैं.बहस केवल रचना पर होनी चाहिए .

केवल रचना पर! अधिरचना पर नहीं ! रचना पर या महज़ रचना कौशल पर ? बकौल मुक्तिबोध प्रत्येक रचना किसी जीवन समस्या से जन्म लेती है . जीवन समस्या का रिश्ता आधार से होता है और अधिरचना से भी.रायपुर समारोह की सब से बड़ी उपलब्धि यह रही की बहस रचना से अधिरचना तक चली गयी .'सांस्कृतिक सलवा जुडूम' से लेकर सांस्कृतिक संगठन तक बहस के दायरे में आ गए . साहित्य अकादमी के सामसुंग टैगोर पुरस्कारों के प्रसंग में विष्णु खरे ने लिखा की यह भी सांस्कृतिक सलवा जुडूम है . रायपुर में हो चाहे दिल्ली में, इन प्रायोजनों का मकसद इस के सिवा और क्या है की लेखकों को लेखकों से भिडाओ .जिन्हें पीटना है , उन्हें बिरादरी से ही पिटवाओ.जब तक वे सब के सब विपक्ष में रहेंगे , एक साथ एक सुर में सत्ता के खिलाफ चीखते पुकारते रहेंगे. एक सुर एक राग गड़बड़ है अगर वह पंचम सुर में राग दरबारी नहीं है. उस में फांक पैदा करो. टुकड़े फेंको, टुकड़े. फिर देखो क्या मार होती है.विरोध किस तरह सहमतियों की सांस्कृतिक बहुलता और विचारों के संसदीय जनतंत्र में बदल कर हां हां हुआँ हुआँ हो जाता है.

जो टुकड़खोर नहीं हैं , उन को काउंटर करने के लिए एनकाउन्टर स्पेशलिस्ट हैं , न! आयोजन समितियों से लेकर चयन समितियों तक में छाये हुए.

सरकार लेखकों को लड़ाने के लिए निजी एजेंसियों की शरण में जा रही है तो निजी एजेंसियां सरकारों को लड़ा देने के ख्वाब सजा रहीं हैं.आइ आइ पी एम् के अरिंदम सेन ने महाश्वेता देवी , मेधा पाटकर , ममता बनर्जी और खुद के लिए मानवता विका स पुरस्कारों की घोषणा .की है.ये पुरस्कार बंगाल में स्टालिनवाद के उन्मूलन के लिए दिए जा रहें हैं .अरिंदम सेन महाश्वेता को पुरस्कृत करें , यह वैसे ही है जैसे रमण सिंह नामवर सिंह को पुरस्कृत करें साहित्य में विचारधारा की तानाशाही का मूलोच्छेद करने के लिये.

पुरस्कारों के राजनीतिक निहितार्थ हों, यह कोई नयी बात नहीं. नयी बात है संस्कृति और मानवाधिकार के इलाके का नया महत्व.विश्वरंजन का मौलिक योगदान यह है की उन्होंने नक्सल विरोधी अभियान के सन्दर्भ में इस महत्व को समझा है .उन्होंने बार बार कहा है -' नक्सली दस्तावेजों से साफ जाहिर होता है कि उनके एजेंट बहुत सारे प्रजातांत्रिक आंदोलनों और संगठनों (जिन्हें वे आंशिक आंदोलन कहते हैं) में भी घुसपैठ कर चुके हैं जहां की सोंच को वो धीरे-धीरे विकृत करेंगे जनयुद्ध के निर्णायक दौर के समय इस्तेमाल करने के लिए । पर इस लड़ाई में हमें सभी स्तरों पर लड़ना होगा।' [छत्तीसगढ़ अखबार में १५ सितम्बर २००७ को प्रकाशित विश्वरंजन का आलेख .]

'सभी स्तरों पर लड़ना होगा।' सलवा जुडूम एक स्तर है, सांस्कृतिक सलवा जुडूम दूसरा .इस ख़ास परिदृश्य को ध्यान में रखे बगैर संस्कृति मंचों की भूमिका और प्रासंगिकता को लेकर बहस करना बेमानी है.

अभी ''वाक्' में प्रकाशित कुछ लेखों में बहस उठायी गयी है की जमाना बदल चुका है. ये संचार क्रांति और नए मीडिया के दिन हैं. इस जमाने में व्यक्ति का महत्व बढ़ा है, जब की संगठनों की भूमिका खत्म हो चली है.ऐसे में वाम लेखक संगठन भी रीतिकालीन हो चलें हैं. वहाँ घिसीपिटी विचारधाराओं के रीतिकाल चल रहें हैं.निरा पिष्टपेषण चल रहा है, नया कुछ होने हवाने की गुंजाइश नहीं रही.उत्तर-आधुनिक स्थितियां हैं जिन में शब्दों के अर्थों का अनर्थ हो चुका है.लोकतंत्र, धर्म निरपेक्षता, समाजवाद - ऐसे सभी परमपूज्य आधुनिक शब्द अपनी उलटबांसियों में बदल चुके हैं.इतिहास , साहित्य, लेखक , कर्ता....सब का अंत हो चुका है.ऐसे में लेखक संगठनो के लिए कोई काम हो सकता है , तो वह है, हिंदी के गरीब लेखकों के कल्याण के लिए , उन्हें प्रकाशकों के शोषण से बचाने के लिए , कुछ जन -जागरण करना , चन्दा शंदा करना .लेकिन लेखक संगठन तो यह भी नहीं करते. वे पार्टी के तानाशाहों ,नौकरशाहों और उन के चापलूसों के लिए आत्मोत्थान के साधन मात्र बन कर रह गएँ हैं.वे प्रतिभाओं के उत्पीडन और नकलियों की नक्शेबाजी के अड्डों में बदल चुके हैं.गर अब भी वे अपना भला चाहते हों , तो उन्हें सब से पहले उन राजनीतिक पार्टियों के शिकंजे से मुक्त हो जाना चाहिए , जिन से वे नाभिनालबद्ध हैं.

ये बातें लेखक ने केवल सैद्धांतिक आधार पर नहीं कहीं हैं. एक ख़ास लेखकसंघ में काम करने के अपने अनुभवों के आधार पर भी कहीं हैं,सब जानते हैं की एक अन्य लेखकसंघ के बारे में भी मिलती जुलती बातें उस के अनेक सदस्यों की ओर से कही गयीं हैं . कई लेखकों ने इस्तीफे भी दिए हैं. वाम संस्कृति का जो तीसरा मंच है, उस पर भी एक पुराने सदस्य ने ऐसे ही आरोप लगाये थे , जब उस से रायपुर समारोह में शामिल न होने के मंच के फैसले के खिलाफ जाने के लिए स्पस्टीकरण माँगा गया था .

सांस्कृतिक संगठनों में पार्टियों की तानाशाही का एक नमूना देखें . भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के मनीष कुंजम छतीसगढ़ में सलवा जुडूम के खिलाफ आवाज उठाते रहें हैं. वे माओवादी हिंसा की भी आलोचना करते हैं और स्थानीय संसाधनों की कार्पोरेट हड़प लीला की भी.उन की जान पर दोतरफा ख़तरा है. विश्वरंजन के सिपाही उन्हें नक्सली करार दे कर उन का उत्पीडन करते हैं.सरकार ने उन के एकमात्र सुरक्षा गार्ड को भी हटा दिया है. लेकिन प्रगतिशील लेखक संघ , जिसे भाकपा से नाभिनालबद्ध बताया जाता है , विश्वरंजन के समारोहों में शामिल हो कर गौरवान्वित महसूस करता है. क्या आज वामपंथी पार्टियां खुद इस हालत में हैं की वे सांस्कृतिक संगठनों पर पर स्तालिनवादी किस्म का नियंत्रण कायम कर सकें?आज असली संकट पार्टियों की तानाशाही नहीं,बल्कि यह है की पार्टियाँ और जन संगठन एक दुसरे से इस कदर स्वायत्त हो गएँ हैं की बाएं हाथ को पता ही नहीं की दाहिना हाथ क्या कर रहा है.अचरज यह है की जिन्हें सारी दुनिया की उलटबांसियां दिखाई दे रहीं हैं , उन के लेखे केवल भारत की वामपंथी पार्टियाँ अपने शुद्ध शाश्वत शाश्त्रीय रूप में बची हुयी हैं!

अब सूचना- संचार- मीडिया क्रांति पर दो एक बातें. समझदारों का कहना है की इस क्रांति ने जनतांत्रिक अवकाश का अभूतपूर्व विस्तार किया है.जेसिका, आरुशी , रुचिका के मामले ज़िंदा हैं तो इसी क्रांति के बदौलत. इंटरनेट तो शायद आग के बाद मानवजाति का दूसरा सब से महत्वपूर्ण आविष्कार है .यह तो मैं अपने निजी अनुभव के आधार पर भी कह सकता हूँ की इंटरनेट ने खुद मेरी जिन्दगी को जितना बदल दिया है , उतना न न्यूटन के गुरुत्वाकर्षण ने बदला था , न आइनस्टीन के सापेक्षतावाद ने. जरूरी जानकारियों के लिए आज न मुझे सरकार का मुंह देखना है न निजी चैनलों का. आप सब से सुख दुःख की दो बातें करने के लिए भी मुझे न किसी सेठ का मुंह देखना है , न किसी जेठ का.

तो जेसिका , आरुशी , रुचिका को न्याय मिल जाएगा न? और निठारी के नरपिशाचों को भी?मोदी , आडवाणी , वाजपायियों को? मनमोहन , सोनियों , राहुलों को ? लालुओं , मुलायमों . ममताओं , बुद्धदेवों को ?बुशों , ब्लेअरों , ओबामाओं को? ? कम से कम मुझे तो ऐसी उम्मीद नहीं. तकनीक अन्तःतः ताकतवरों की ही सेवा करती है. ज्ञान और विचारधाराएँ भी. लोकतंत्र सब से अधिक साम्राज्यवाद के ही काम आया न ?यहाँ तक की मार्क्सवाद भी? और उत्तराधुनिकतावाद?

इंटरनेट इस समय पूँजी का सब से बड़ा अखाड़ा है. संस्कृति सहमतियों के उत्पादन का औजार पहले भी थी . आज तकनीक ने उसे एक ऐसी ताकत मुहैय्या कर दी है जो पहले कभी मुमकिन न था.चौबीस घंटों के न्यूज चैनल किस संस्कृति का निर्माण कर रहे हैं?व्यक्ति ताकतवर हुआ है या इतिहास के इसी दौर में सब से अधिक अकेला? सांस्कृतिक सलवा जुडूम के लिए जिस जंगल की जरूरत है, उसे पूँजी , तकनीक और सूचना विस्फोट के इस नए जमाने ने ही जन्म दिया है.

हाँ , प्रतिरोध की ताकतें भी इस तकनीक क्रांति के लाभ ले सकतीं हैं . जैसे की वे पहले भी ले सकतीं थीं. लेकिन ऐसा वे तभी कर सकतीं हैं , जब वे संगठित हों. जैसा की जन संस्कृति मंच के महासचिव प्रणय कृष्ण ने मंच के पिछले सम्मलेन में चेताया था, पूँजी की ताकत का मुकाबला केवल संगठन की ताकत से किया जा सकता है!

इस लिए आज संगठनों की तमाम कमजोरियों का इलाज यह नहीं है की उन्हें दफना दिया जाय .जरूरत यह है की उन पर भरपूर बहस की जाय , बीमारियों का सही निदान किया जाय, ताकि संगठन ठीक तरीके से वह काम कर सकें जो केवल वही कर सकते हैं. आज जब संस्कृति की लड़ाई अपने सब से अधिक खतरनाक और नाजुक दौर में है , तब सांस्कृतिक संगठनों को ही प्रतिरोध के अगुआ दस्तों के रूप में काम करना है. क्या हम भूल गए की पिछले दो दशकों में इस देश में प्रतिक्रया का जो पुनरुत्थान हुआ है उस का नेतृत्व एक ऐसे संघ ने किया है जो अपने को एक सांस्कृतिक संगठन कहता है?

आज हिंदी के वामपंथी लेखकों के बीच दो तरह के आत्मघाती विचार चलन में है. एक तरफ वे हैं , जो हर बहस को बेवफाई करार दे रहे हैं. दूसरी तरफ वे हैं जो बेवफाई को ही आज की विचारधारा बता रहें हैं.अब आप ही यह तय करें की आप किस ओर हैं!

17 comments:

Santosh said...

Well written post. In fact, It is a wonderful debate on how and why India as an entity is shattering, why even the Marxism is becoming a slave to Materialism? It seems India is going through a radical and fast historical change; for good or bad is not sure. Suddenly, it is the money and the power which are becoming all powerful and corrupting every thing. A literary writer is not untouched by it!

S.C.kushwaha said...
This comment has been removed by the author.
S.C.kushwaha said...

भाई साहब, मैं तो सांस्कृतिक सलवा जुडूम और साहित्यिक सलवा जुडूम के खिलाफ हूं..बहुत ही अच्छा । बधाई
सुभाष चन्द्र कुशवाहा

शिरीष कुमार मौर्य said...

देवताले जी के हाहाकार को मैं तभी से जानता हूँ. बकौल वीरेन डंगवाल " एक कवि आख़िर कर ही क्या सकता है...सही बने रहने की कोशिश के सिवा" भाई आपने इस कविता को यहाँ देकर बहुत अच्छा किया. आपका आलेख भी विचारवान है...और हमें भी विचारवान बनाने में मदद करता है. शुक्रिया.

मृत्युंजय said...

संस्कृति की भट्ठी में कच्चा गोश्त रहे थे भून,
अब तक छुपे हुए थे उनके दांत और नाखून,
नहीं किसी को दिखता था दुधिया वस्त्रों पर खून,
संस्कृति की भट्ठी में कच्चा गोश्त रहे थे भून !!


अजी समझ लो उनका अपना नेता था जयचंद,
हिटलर के तम्बू में अब वे लगा रहे पैबंद,
तक्षक ने सिखलाये इनको सर्प नृत्य के छंद,
अजी समझ लो उनका अपना नेता था जयचंद!!

(बाबा ने इन खानदानी लोगो को क्या खूब पकड़ा था.)

डा. मेराज अहमद said...

आशुतोश जी बहुत बहुत बधाई!
दबाव रहित इस माधयम के द्वारा आप के विचार और रचनाओं ी आलोचना से हम लोग रू-बरू होते रहेंगे। इस अशा के साथ ब्लाग की दुनिया में आप का स्वागत है।

आशुतोष कुमार said...

शुक्रिया दोस्तों , बाबा की पंक्तियाँ तो मैं जगह दुहराता फिर रहा हूँ. उन्होंने हमारे समय को पहले ही देख लिया था.

रंगनाथ सिंह said...

ब्लाग-जगत में आपका स्वागत है।

Dhiresh said...

मुझे लगता है कि सरकारों के काम को बुद्धिजीवियों ने खुद ही आसान कर दिया है. हिंदी का लेखक तो यूँ भी अपने समाज की उपेक्षा, आलोचकों से उपेक्षा जैसे राग अलापता चलता है. अब वो खुद ही चला जाता है प्रतिष्ठानों के पास, बहुत अपमानित होता हुआ भी, कुछ टुकड़े चाटने. वाक् के संपादक को इस पीढी के भ्रष्टतम लोगों में शुमार किया जाएगा. जिस विश्विद्यालय में वो माफिया है, वहां उसने कैसे लोगों को प्रमोट किया है, उसके अधीन हो रही पी एच डी ही यह बता देंगी. विचारों का युग ख़त्म हो चुका है, इसलिए वो एक यौन शोषण के अपराधी को बचाने के लिए जान लगा देता है. यह सोचकर शर्म आती है कि वो उसी सव्यसाची के शहर से आया था जिसे छल और इतराना कभी न आया था.
पिछले दिनों पुरस्कारों खासकर संघ और बीजेपी को सलाम बजाने की निंदा के बाद बहुत सारे लेखकों को एतराज भी हुआ. सिर्फ रचना पर बात करो, यह नया शिगूफा है. आपने बंगाल की और ध्यान दिलाकर भी ठीक किया है. मुझे लगता है कि इस वक़्त किसी को महान मानकर उसके हर किये-धरे पर आँखे मुड़ने की जरूरत नहीं है और न इस बात पर शर्मिंदा होने की कौन किस संगठन से है. ब्राह्मणवादी और करिअरीस्ट हर कहीं हैं. मुझे तो प्रभाष जोषी को लेकर कई बड़े लोगों के रुख पर भी हैरानी हुई कि कैसे एक जनद्रोही (कम से कम स्त्री और दलित विरोधी रवैये को देखते हुए) को पब्लिक इंटलेक्चुअल बता दिया गया .

अभय तिवारी said...

धारदार लिखा है भाई!
बहुत सारे मसले हैं.. लम्बी बहस है लेकिन आख़िर का सवाल दो टूक है। बाक़ी सब छोड़ उसी का जवाब देता हूँ.. या एक और सवाल उठाता हूँ कि वफ़ा किस से की जाने की उम्मीद है? किसी पार्टी से? किसी विचारधारा से? दोस्तों की जमात से? या आप के दिल में बैठे न्याय की अवधारणा से, मानवता और सृष्टि (मानवता अभी शेष जीवन के ख़िलाफ़ भी हो चली है) की चिन्ता से?
एक से वफ़ा निभाना दूसरे से बेवफ़ा हो जाना है.. मैं ने तो कोशिश की है अपने नैतिक मापदण्डों के प्रति वफ़ादार रहूँ.. बाक़ी सब दोयम है। दुनिया के प्रति और अपने प्रति दोनों के प्रति गाफ़िल हो कर एक दी दी हुई समझ पर ही अड़े रहना मुझे ठीक नहीं लगता। लेकिन वो बेवफ़ाई प्रतीत होगा.. होता है।
फिर बन्धु-बान्धव बहुत जल्दी बिल्ला चिपकाने की हड़बड़ी में भी रहते हैं, ज़रा सी असहमति होते ही पति्त और प्रतिक्रियावादी की उर्फ़ियत से नवाज़ते हैं।
बातें और भी बहुत दूसरी हैं.. लेकिन अभी ख़ुशी की बात ये है कि आशुतोष कुमार की वैचारिक तरंगे संगठन की सभाओं के बाहर आभासी जगत को भी आलोड़ित करेंगी।
स्वागत है मित्र!

jayant said...

ab sahi madhyam chuna hai aapne, badhaiyaan.
naye aur unmukt vicharon ko padhna hamesha prerak hota hai.

jayant

HINDI AALOCHANA said...

jaruri aur vicharottejak tippni ke liye badhai......

rajeev ranjan giri

HINDI AALOCHANA said...

jaruri aur vicharottejak tippni ke liye badhai......

Anonymous said...

Sorry boss. Very enlightening as a report on the state of 'sanghs' but you end with an exhortation for correct focus among cultural group- what is that 'focus' or further elaboration on "संगठन ठीक तरीके से वह काम कर सकें जो केवल वही कर सकते हैं" will help. Deadly as critique but fizzles out as an viable alternative system. 'भरपूर बहस' appears to be a lazy escape.

आशुतोष कुमार said...

anonymus ji , the point u make is important.

Guatam. said...

Hi Sir,
It has been long that we have seen a blog. When is coming next blog?

अशोक कुमार पाण्डेय said...

shandar hastakshep..