Sunday, December 12, 2010

क्या शताब्दियाँ स्मृति से भी अधिक विस्मृति का वितान रचती हैं?

इस शताब्दी -समय में


हिंदीजगत में महाशताब्दियों की धूम शुरू हो चुकी है. अगला साल फैज़, अज्ञेय , शमशेर , केदार और नागार्जुन की जन्म शताब्दी का साल है.कवीन्द्र रविन्द्र की डेढ़सौंवी जयन्ती है. लेखों , किताबों , गोष्ठियों , समारोहों का सिलसिला चल पडा है.इस सिलसिले में राज-प्रतिष्ठान भी शामिल हैं और प्रतिरोधी लेखक- संगठन भी.
जरूरी है सांस्कृतिक स्मृति को जीवित रखना. तारीखें इस में मददगार होती हैं.
लेकिन याददाश्त की विडम्बना यह है कि जो याद होते हैं , वही याद आते हैं.अगले बरस ही मजाज़ , गोपाल सिंह नेपाली और आरसी प्रसाद सिंह की शताब्दियाँ भी हैं.और यह साल , जो बीत चला है, भुवनेश्वर की जन्म शताब्दी का साल है.
भुवनेश्वर को याद किया उन के जन्म के शहर शाहजहांपुर ने . शाहजहांपुर के बाहर भुवनेश्वर को कितना याद किया गया ?हिंदी समाज को भुवनेश्वर की याद क्यों न आयी ?क्या इस लिए कि याद करना उन्हें जीते जी भुला देने के सांस्कृतिक अपराधबोध को पुनर्जीवित करना होता ?भुवनेश्वर जैसी प्रतिभाएं किसी भाषा समाज में इक्की दुक्की ही होती हैं .' ताम्बे के कीड़े ' ,'स्ट्राइक ' जैसी एकांकियों और ' भेड़िये ' जैसी कहानी के इस लेखक के पास यथार्थ की जैसी भावुकताहीन आलोचनात्मक संरचना थी , वह आज भी दुर्लभ है .क्या वे भुला दिए जाने लायक हैं?क्या उन्हें भुलाया जा सकता है ? भुवनेश्वर और मजाज़ जैसी प्रतिभाओं की याद हमें शताब्दी- उत्सवों पर दुबारा गौर करने का एक मौक़ा फराहम करती है.
क्या शताब्दियाँ स्मृति से भी अधिक विस्मृति का वितान रचती हैं?क्या चंद चुने हुओं को याद करना उन बाकियों को भुला देना है जो चुने नहीं गए ? यह चुनाव कौन करता है ?कौन तय करता है कि स्मरण के शोर में किन आवाजों को बिना किसी आह्ट के डूब जाने देना है ?ये सवाल मजाज़ को फैज़ से और अज्ञेय को भुवनेश्वर से भिड़ा देने के लिए नहीं है.बात यह है कि हर चुनाव जितना दाखिल करता है , उस से कही अधिक खारिज करता है.यह चयन प्रक्रिया की प्रकृति है, केवल परिणति नहीं.

चयन कैननाइज़ेशन है. साहित्य संस्कृति की दुनिया में यह एक स्वाभाविक बात समझी जाती है.
बाख्तिन ने बताया था-'' कैननाइज़ेशन साहित्य की सभी विधाओं की एक ऐसी प्रवृत्ति है जिस में अस्थायी मानकों और पद्धतियों का इस तरह स्थिरीकरण किया जाता है कि वे स्थाई जान पड़ती हैं और तब मूल्यांकन भी संस्कृति और समय की सापेक्षता में नहीं दिखाई पड़ते , देशकालनिरपेक्ष प्रतीत होते हैं.''
संकट यही है.अस्थायी मूल्यों का स्थायीकरण.
निस्संदेह रवींद्रनाथ ने सांस्कृतिक युग -परिवर्तन किया था. अज्ञेय एक नया सौन्दर्य - बोध ले कर आये थे , जिस की एक अपरिहार्य ऐतिहासिक अर्थवता थी . एक ऐतिहासिक सांस्कृतिक प्रक्रिया में उन्होंने अपनी भूमिकाएं प्रभावशाली ढंग से निभाईं.
लेकिन उन के समय में भी , अनंतर भी , कुछ उन से सीखते हुए तो कुछ सीख लेते हुए , कुछ साथ चलते तो कुछ लड़ते- झगड़ते भिन्न प्रकार की सांस्कृतिक दृष्टियाँ उभर कर आयीं. उन में से कुछ ने अपने अलग कैनन भी बनाए.लेकिन कैनन तो कैनन है.वह दाखिल खारिज के सिद्धांत पर ही खडा होता है.वह जब भी बनता है,जितना बचाता है , उस से अधिक मटियामेट कर देता है.
कैननाइज़ेशन सांस्कृतिक जीवन्तता का विलोम है. वह मूल्यों का एक चौखटा बनाता है.सांस्कृतिक गतिशीलता को ठप्प कर के ठस्सपन की संस्कृति को बढ़ावा देता है. जनरुचि को कीलित करता है. अधिकाँश पढ़े- लिखे भी वही पढ़ते- लिखते हैं, जो पाठ्य -पुस्तकें पढ़ाती हैं.पाठ्य - पुस्तकों की तरह स्मृति -उत्सव भी कैननाइज़ेशन की प्रक्रिया में शामिल होते है.वे 'अज्ञेय' को बचाते हैं और भुवनेश्वर को अज्ञेय बना देते हैं.उन के अपने समय के लिए और आने वाले समयों के लिए भी.
कैननाइज़ेशन सांस्कृतिक प्रक्रिया उतनी नहीं है जितनी राजनीतिक कार्रवाई है. यानी जनरुचि को निर्देशित और निर्धारित करने का उद्यम .राजनीतक सहमति और सहनशीलता के उत्पादन का औजार. राजनीतिक अनुकूलता केवल डंडे के जोर से या प्रचार और प्रोपेगैंडा की बदौलत ही नहीं हासिल की जा सकती. अधिक सहज और टिकाऊ वह तब होती है ,जब वह सांस्कृतिक अनुकूलन के जरिये हासिल की जाती है. सांस्कृतिक मुख्यधारा राजनीतिक मुख्यधारा को मजबूत बनाती है. यही कारण है कि कैनन बनाने में व्यवस्था के मुसाहिबों की सब से ज्यादा दिलचस्पी होती है.

कैनन सांस्कृतिक अनुकूलन का काम मुख्यतः तीन चरणों करता है.एक तो वह रूचि के दायरे को सीमित करता है. वह 'महत्वपूर्ण ' और 'सुन्दर ' की एक संशयमुक्त स्पस्ट अवधारना प्रस्तुत करता है. ' महानता' को परिभाषित करता है. इस परिक्षेत्र या दायरे को पार करना कठिनतर होता जाता है.इस सुगढ़ सीमांकन के जरिये संदिग्द्ध प्रतीत होने वाली रुचियाँ जनक्षेत्र से बाहर धकेल दी जाती हैं. इस पहले चरण को परिसीमन कहा जा सकता है.
दूसरे, और यह अधिक बारीक काम है, वह चुने गए सांस्कृतिक प्रतीकों और व्यक्तित्वों को भी एक विशिष्ट अर्थ प्रदान करता है. एक सांस्कृतिक प्रतीक , चाहे वह कोई वस्तु हो या व्यक्ति, एक से अधिक अर्थो का प्रतिनिधित्व करता हो सकता है.उस में जटिलताये और नवीन व्याख्याओं की संभावानाएं हो सकती हैं. कैनन इन जटिलताओं और सम्भावनाओं को संपादित करता है. वह उन्हें एक सरल और सुविधाजनक अर्थ प्रदान करता है. उदाहरण के लिए भगत सिंह जैसे क्रांतिकारी चिन्तक को देशभक्ति के प्रतीक में घटाया जा सकता है.तिरंगे झंडे के रंगों की व्याख्या , उन के ऐतिहासिक विकासप्रक्रिया को भुला कर, बहुसंख्यक समुदाय की साम्प्रदायिक चिह्नों के सन्दर्भ में की जा सकती है. ' हम होंगे कामयाब' को उदारीकरण का मार्चिंग सॉंग बनाया जा सकता है. होने को यह भी हो सकता है कि त्रिलोचन को साक्षरता का संदेशवाहक और नागार्जुन को हरितक्रान्ति का हिरावल बना दिया जाए. अज्ञेय को व्यक्तिवाद का प्रतीक लगभग बनाया ही जा चुका है.इस प्रक्रिया को विशिष्टीकरण कहा जा सकता है.
तीसरा चरण सब से ज्यादा बारीक है. यह सांस्कृतिक प्रतीकों से समाज के रिश्ते को अपनी जरूरत के हिसाब से डिजाइन करना है. जैसे ही कोई वस्तु या व्यक्ति कैनन में शामिल होता है, समाज से उस का जीवंत रिश्ता ख़त्म हो जाता है. वह समाज की ज़द में नहीं रह जाता. अब आप उस से जब जैसे चाहें बोल- बतिया नहीं सकते, लड़ झगड़ नहीं सकते , परस्पर एक दूसरे को बदल नहीं सकते. समाज की बनायी हुयी चीज , धरती पर पला बढ़ा इंसान , उन से छीन कर स्वर्ग को दे दिया जाता है. वह लगभग किसी स्वर्गीय वस्तु या देव - प्रतिमा में बदल जाता है. यह दिव्यता धरती पर खड़े मनुष्य से उस के संवाद को तो कठिन बनाती ही है, खुद मनुष्य को एक आराधक या दर्शनार्थी में बदल देती है. उत्पादकों का समाज मूकदर्शकों की मंडली में बदल जाता है.इस मूकदर्शक का सांस्कृतिक व्यवहार वैसा ही होता है, जैसा टी वी दर्शकों का होता है. वह आनंदित होता ही , ऊबता है, लेकिन न तो हस्तक्षेप के सकता है, न टी वी ऑफ कर पाता है. इस चरण को प्रतिमाकरण अथवा दैवीकरण कह सकते हैं.

सवाल असल में यह है कि क्या उत्सव के होहल्ले में इन सवालों पर गौर करने का समय बचा है.कोई तर्क कर सकता है , जैसे व्यवस्था अपने कैनन बनाती है , वैसे ही व्यवस्था बदलने वालों को भी अपने कैनन क्यों नहीं बनाने चाहिए . क्या इसी तरीके से स्थापित कैननों को चुनौती देने की जरूरत नहीं है. क्या प्रतिरोध के सांस्कृतिक प्रतीकों की रचना नहीं की जानी चाहिए. इस सवाल के किसी सुलझे हुए जवाब तक पहुँचने के लिए कैननाइज़ेशन की प्रक्रियामात्र के सांस्कृतिक राजनीतिक- अभिप्रायों पर ध्यान देना जरूरी है. जरूरी है स्मरण के शोर में छुपी हुयी विस्मृति की मौन गर्जना को सुनने की कोशिश करना.

शताब्दी - समय में यह जरूरी काम भी हो जाए तो क्या बुरा हो !



9 comments:

ZEAL said...

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आशुतोष जी ,

कैनानाईजेशन का कांसेप्ट बहुत अच्छा लगा। सकारात्मक बदलाव की माग एक कैनन स्वरूपी प्रतिरोध ही पूरा कर सकता है। निश्चय ही इसकी सांस्कृतिक परंपरा को स्वीकृति मिलनी चाहिए।

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किलर झपाटा said...

ज़ील जी ने सही कहा आशूतोष जी। बहुत बारीकी से देखा जाए तो सच में विस्मृति का वितान रचती हैं। फिर मनाना ज़रूरी है आय थिंक।

भारत भूषण तिवारी said...

स्मरण के शोर में छुपी हुई विस्मृति की मौन गर्जना सुनने की कोशिश में निर्व्यक्तिकरण के प्रति अतिरिक्त आग्रह नज़र आता है. और फिर पूछा जा सकता है कि ऐतिहासिक द्वंद्ववाद और वैज्ञानिक समाजवाद पर आधारित विश्व-दृष्टि को 'मार्क्स'वाद कहते जाना भी कहीं कैननाइज़ेशन को बढ़ावा देना तो नहीं?
'कैननाइज़ेशन' (बुर्जुआ) व्यवस्था करती है; उसे बदलने की चाह रखने वाले तो फ़क़त 'कमेमरेशन' करते हैं. तरीका ज़रूर एक जैसा लग सकता है, पर दोनों में वही फर्क है जो बरखा दत्त और पी साईनाथ के बीच है, जो 'सामना' और 'समकालीन जनमत' के बीच है. और हाँ, इस कमेमरेशन में 'कहो रे भाई सब संतन की जय' की गर्जना भी सुनाई देती है ना?

आशुतोष कुमार said...

संस्कृति के क्षेत्र में कैनन को ख़त्म नहीं किया जा सकता. व्यवस्था बदलने की लड़ाई भी एक तरह से कैनन को बदलने की लड़ाई है. खतरा कैनन के स्थायी करण में है.बकौल बाख्तीन कैननाइज़ेशन यही है. इस खतरे के प्रति सचेत न रहने से व्यक्तिपूजा की प्रवृति को निश्चित बढ़ावा मिलता है. निरंतर आलोचनात्मक बने रहना कठिन हो जाता है. शायद इसी कठिनाई से बचने के लिए लोग किसी न किसी कैनन को स्वीकार कर लेते हैं. हिंदी में हालिया उदाहरण भारतेंदु के पुनर्मूल्यांकन का है. भारतेंदु की उपलब्धियां अपनी जगह, लेकिन आज जब कोई उन के कुछ अंतर्विरोधों की तरफ इशारा करता है, तब भावनाएं इस कदर हावी हो जाते हैं कि बात सुनी जाने के पहले ही खारिज कर दी जाती है.आज जब दलित लेखक हिंदी के स्थापित कैनन को चुनौती देता है,तब गंभीरता से उस का सामना करने की जगह एक बेचैन बौखलाहट परिदृश्य को जकड लेती है. जब प्रकाशचन्द्र गुप्त, रांगेय राघव , राहुल सांस्कृत्यायन आदि ने तुलसी की महता को चुनौती दी , तब क्या हुआ? मार्क्सवादी आलोचना को तब तक गंभीरता से नहीं लिया गया , जब तक राम विलास जी ने तुलसी की सामंतविरोधी महत्ता न ढूंढ निकाली. ऐसे बहुत से कारण हैं , जिन के चलते कैननाइज़ेशन की प्रक्रिया पर गहराई और बारीकी से सोचने की जरूरत लगती है.

अविनाश वाचस्पति said...

आज दिनांक 21 दिसम्‍बर 2010 के दैनिक जनसत्‍ता में संपादकीय पेज 6 पर समांतर स्‍तंभ में आपकी यह पोस्‍ट शताब्‍दी समय में  शीर्षक से प्रकाशित हुई है, बधाई। स्‍कैनबिम्‍ब देखने के लिए जनसत्‍ता  पर क्लिक कर सकते हैं। कोई कठिनाई आने पर मुझसे संपर्क कर लें। 

गिरीश बिल्‍लौरे और अविनाश वाचस्‍पति की वीडियो बातचीत

भारत भूषण तिवारी said...

व्यवस्था बदलने की लड़ाई को कैनन बदलने की लड़ाई कहना उसे रिड्यूस करना है. कैननाइज़ेशन पूंजीवादी समाज का वैशिष्ट्य है, बिलकुल राष्ट्र-राज्य या सेना की तरह. इसलिए उसके स्थायीकरण को लेकर चिंता मुझे वाजिब तो लगती है पर ओवरव्हेल्मिंग नहीं.
प्रतिरोध के राजनीतिक-सांस्कृतिक प्रोजेक्ट के दो अवयव मुझे नज़र आते हैं. पहला सकारात्मक अवयव है 'कमेमरेशन', जिसके माध्यम से पुनर्मूल्यांकन किया जा सकता है. इसमें भावनाओं के हावी होने के खतरा है इस बात से सहमति है.
दूसरा नकारात्मक अवयव है - 'डीकैननाइज़ेशन' (तोड़ने ही होंगे...) जिसके माध्यम से व्यक्तिपूजा का निषेध, 'हर चीज़ की निर्मम आलोचना' आदि बातें उपार्जित की जा सकती हैं.

आशुतोष कुमार said...

हाँ अब ठीक दिशा में विक्सित हो रहा है विमर्श . इसे आगे बढ़ाइए.

आशुतोष कुमार said...

हाँ अब ठीक दिशा में विक्सित हो रहा है विमर्श . इसे आगे बढ़ाइए.

Anonymous said...

२१ दिसम्बर को आपके अखबार में प्रकाशित आशुतोष कुमार के लेख शताब्दी समय में कुछ बातें थोड़ी दिक्कत तलब हैं. एक तो भुवनेश्वर के बारे में उनकी जानकारी थोड़ी कम है. उनको जानना चाहिय की शाहजहांपुर से बहार भी उनको याद किया गया.अ इलाहबाद में भुवनेश्वर पर न सिर्फ गोष्ठियां हुई बल्कि तीन दिन का नाट्य समारोह भी आयोजित हुआ. रही बात उनके द्वारा शताब्दी समारोह करने या कैनन आदि पर बहस की तो याद किया जाना चाहिए की अभी कुछ बरस पहले ही भगत सिंह की शताब्दी बीती है और १८५७ के महासंग्राम की १५० वी सालगिरह इनको किसी सत्ता धारियों ने नहींबल्कि उनकी विस्मृति के खिलाफ आम लोगो ने उनको याद करके साम्राज्यवाद के खिलाफ संघर्ष की परंपरा को याद करने में किया. नागार्जुन या केदार या फैज को याद करने का भी यही मतलब है.कोई और नहीं बल्कि आशुतोष कुमार ही यह लेख लिक्खकर एक लेखक के बरक्श दुसरे को भिड़ा देने की जुगत करते दिखाई पड़ते है.

नासिर कबीर